Wednesday, February 4, 2009

जिसकी कोई सीमा नही वही अनहद

आज मनुष्य किसी न किसी रूप में संगीत का आनंद उठाता है। यह अलग बात है कि कोई यह आनंद भजन के रूप में लेता है तो कोई गजल, गाने, कौवाली, पश्चिमी संगीत या शास्त्रीय संगीत को सुनकर आनंदित होता है। संगीत पद्धति चाहे कोई भी हो, लेकिन आनंद संगीत में ही आता है। परंतु संसार में चाहे किसी भी पद्धति द्वारा संगीत सुनें उसकी एक सीमा है। कहीं न कहीं वह संगीत खत्म हो जाता है। बहुत से लोग यह कहते हुए भी सुने जा सकते हैं कि जब मंदिर या गुरुद्वारे में कीर्तन सुन रहे थे, तब तक मन शांत था। परंतु संसार के कार्यो में आकर यह मन फिर उलझ गया। हमारी यह स्थिति वैसी ही है, जैसे कि कोई व्यक्ति जब इत्र की दुकान के नजदीक से गुजरता है तब वह इत्र की सुगंध प्राप्त कर आनंदित होता है। परंतु उसके आनंद की सीमा है। जब वह इत्र की दुकान से दूर चला जाता है, तब वह उस सुगंध से वंचित हो जाता है। यदि वह इत्र को खरीद कर अपने शरीर पर लगा ले और इसके बाद वह कहीं भी चला जाए तो इत्र की सुगंध भी उसके साथ-साथ जाएगी। इसी तरह हमें भी उस आनंदमय संगीत की प्राप्ति करनी है। संगीत दो प्रकार का बताया गया है। एक को आहत नाद कहा जाता है और दूसरा अनहद। आहत नाद जो हमारे करताल अथवा फूंक आदि से पैदा होता है। जिसे घंटे, शंख, नगाडे, मृदंग, बांसुरी इत्यादि के द्वारा प्रकट करते हैं। परंतु एक ऐसा संगीत भी है जिसे बजाया नहीं जाता, जो स्वत: अपने आप ही बजता है। लेकिन उसकी प्राप्ति गुरु के द्वारा ही संभव है। उसके लिए कबीर जी कहते हैं कि -

निरभउ कै घरि बजावहि तूर।

अनहद बजहि सदा भरपूर।

उस निर्भय प्रभु के घर में अर्थात् इस मानव शरीर में वह संगीत बज रहा है जो अनहद है। जिसकी कोई सीमा नहीं है, वही अनहद है। लेकिन बाहरी संगीत के संबंध में कहा है कि-

इतु किंगुरी धिआनु न लागै जोगी ना सचु पलै पाइ।

इतु किंगुरी सांति न आवै जोगी अभिमानु न विचहु जाइ॥

गुरु अमरदास जी कहते हैं, जो सांसारिक किंगरी बजा रहा है उससे ध्यान नहीं लग सकता और न ही उससे सचाई हाथ आ सकती है। अत: मन को शांति तो मिलेगी नहीं, अपितु मानव अत्यधिक अभिमान को संचित कर लेता है कि हम तो बहुत संगीत जानते हैं। वास्तव में बाहरी संगीत तो अंतर्जगत की ओर संकेत करता है। मंदिर-गुरुद्वारे में किया जाने वाला संकीर्तन हमें जीवन की सत्यता की ओर इशारा करता है कि इस प्रकार का संकीर्तन जो कि प्रभु के दरबार में हो रहा है वही संकीर्तन हमारे घट में बज रहा है।

देव सथानै किआ निसाणी।

तह बाजे सबद अनाहद बाणी॥

परमात्मा के घर की निशानी बताते हुए गुरवाणी में स्पष्ट किया है कि वहां अनहद वाणी बज रही है। जरूरत है उस स्थान को जानने की, जहां वह अनहद वाणी बज रही है।

पंच सखी मिलि मंगलु गाइआ।

अनहद बाणी नादु वजाइआ॥

जब अनहद वाणी का नाद हमारे अंतर में बजता है, तभी हमारे अंदर में हमारे पांचों मित्र-दया, क्षमा, शील, संतोष एवं सत्य प्रसन्न होकर हमारे लिए आनंद का मार्ग खोल देते हैं। लेकिन यह अनहद वाणी कैसे प्राप्त होती है?

पूरे गुर ते महल पाइआ पति परगटु लोई।

नानक अनहद धुनी दरि वजदे मिलिया हरि सोई॥

पूर्ण गुरु के द्वारा ही वह महल प्रकट होता है, जो हमारी लाज रखता है। श्री गुरु अमरदास जी कहते हैं कि वहां अनहद वाणी बज रही है, वह धुन बज रही है। जब हमें प्रभु के परम तत्व ज्ञान की प्राप्ति होती है, इस संबंध में कहा है-

द्रिसटि भई तब भीतरि आइओ मेरा मनु अनदिनु सीतलागिओ।

कहु नानक रसि मंगल गाए सबदु अनाहदु बाजिओ॥

श्री गुरु अर्जुन देव जी कहते हैं कि जब अंतर्दृष्टि खुलती है तभी अंतर्जगत में प्रवेश कर मन को शांति मिलती है। तभी प्रभु के निर्मल गायन को जान सकते हैं, जब अनहद शब्द की ध्वनि सुनाई देती है। परमात्मा के इस शरीर रूपी घर में प्रकट होने के बारे में कहा है-

पंच सबद धुनि अनहद वाजे हम घरि साजन आए॥

कबीर जी कहते हैं-

पंचे सबद अनाहद बाजे संगे सारिंगपानी।

कबीर दास तेरी आरती कीनी निरंकार निरबानी॥

हे निरंकार! मैं तेरी वही आरती करता हूं जहां पर पांच धुनें बज रही हैं। श्री गुरु नानक देव जी कहते हैं-

घर महि घरू देखाइ देइ सो सतिगुरु पुरखु सुजाणु।

पंच सबद धुनिकार धुनि तह बाजै सबदु नीसाणु॥

जो हमें इस शरीर में ही सच्च्े घर को दिखा दे वही पूर्ण सतगुरु है। जो हमें वह दृष्टि न दे सके और जिसके द्वारा हम अपने हृदय में उस ज्योति को न देख सकें, वह पूर्ण गुरु नहीं है। पूर्ण सतगुरु हमें हृदय में ही प्रभु के दर्शन करा देते हैं, वह हमें वहां पांच शब्दों की अनहद धुनि सुना देते हैं। अब विचार करना है कि उसे पांच शब्द ही क्यों कहा है, क्योंकि आवाजें (ध्वनियां) पांच प्रकार की होती हैं।

पहली आवाज जो हवा से पैदा होती है, जैसे बांसुरी या शंख इत्यादि की आवाज। दूसरी जो तार के कंपन से पैदा होती है जैसे सितार, गिटार, वायलिन, बैंजो आदि की आवाज। तीसरी जो कि चमडे पर थाप देने से पैदा होती है-जैसे तबला, ढोलक, मृदंग, डमरू इत्यादि की आवाज। चौथी आवाज जो दो धातुओं के टकराने से पैदा होती है जैसे घंटा, खडताल, चिमटा या मंजीरा बजाते हैं। पांचवीं पत्ती के कंपन से पैदा होती है, जैसे हारमोनियम इत्यादि की आवाज। इसी कारण इन्हें पांच शब्दों से संबोधित किया गया है। ब्रह्मानंद जी कहते हैं-

पहले-पहले रिलमिल बाजे पीछे न्यारी न्यारी रे।

घंटा शंख बांसुरी बीणा ताल मृदंग नगारी रे॥

एक अन्य स्थान पर कहा है कि -

बिना बजाए निस दिन बाजे घंटा शंख नगारी रे।

बहरा सुन सुन मस्त होत है तन की खबर बिसारी रे॥

बिना बजाए ही वह घंटा, शंख, नगाडे बज रहे हैं, जिसे सुनकर बहरा भी मस्त हो जाता है। यही नाद था जो द्वापर में गोपियां सुना करती थीं, जिसे सुनकर वे मस्त हो जाती थीं। भगवान श्रीकृष्ण से मिलने के लिए व्याकुल होकर दौडी आती थीं। लेकिन वह बांसुरी केवल गोपियों को ही क्यों सुनाई देती थी? क्योंकि गोपियों को ज्ञान मिला हुआ था। अत: वह बांसुरी गोपियां बाह्य जगत में नहीं अपितु अपने अंतर्जगत में सुनती थीं। वह बांसुरी द्वापर में ही नहीं बज रही थी, आज भी बज रही है। जरूरत है तो ऐसे सतगुरु की जिनकी कृपा से हम आज भी उस बांसुरी की धुन को सुन सकते हैं, जो हमारे अंतर में हो रहा है। जो हमें वह कीर्तन सुना दे वही पूर्ण सतगुरु है।

सुणीया बंसी दीया घनघोरा कृका तन मन वांगू मोरा।

बुल्लेशाह कहते हैं कि कन्हैया ने ऐसी बांसुरी बजाई कि मैं मोर की तरह नाचने लगा। जरूरत है उसी बंसी को पहचानने की। बुल्लेशाह कहते हैं कि -

जां मैं सबक इशक दा पढिया मसजिद कोलो जीऊडा डरिआ।

डेरे जा ठाकुर दे वडिया जित्थे वजदे नाद हजार॥

जब सच्चे इश्क को जाना तो बाहरी बातों को छोडकर मैंने अंतर्जगत में प्रवेश किया, जहां हजारों नाद बज रहे हैं। गुरवाणी में कहा है-

अंतरि जोति निरंतरि बाणी साचे साहिब सिऊ लिव लाई।

ऋग्वेद में इस आवाज के बारे में कहा है-

ऋतस्य श्लोको बधिराततर्द कर्णा बुधान: शुचमान आयो:॥

सत्य को जगाने वाली देदीप्यमान आवाज बहरे मनुष्य को भी सुनाई देती है। इसी प्रकार जैसे हम शिव के हाथों में डमरू देखते हैं, विष्णु के हाथ में शंख और सरस्वती के हाथ में वीणा है। ये सब अंतर्जगत की ही वाणी के प्रतीक हैं, जिसे अनहद नाद कहते हैं, अनहद वाणी कहते हैं। जरूरत है कि हम भी उस वाणी को सुन कर अंतर्नाद को जान कर जीवन के संगीतमय आनंद में डूबकर परमानंद को जानें।

एकाग्रता

1. शुभांगी की सबसे बडी दिक्कत थी कि उसमें एकाग्रता की कमी थी। एक पल में यहां तो अगले ही पल वहां। किताब लेकर बैठे दस मिनट भी नहीं बीतते कि किसी दोस्त का फोन आ जाता और वह भूल जाती कि क्या कर रही थी। बोर्ड के एग्जाम जैसे-जैसे नजदीक आ रहे थे मम्मी की परेशानी बढती जा रही थी।

छात्रों के लिए राय

एकाग्रता छात्र जीवन की सबसे महत्वपूर्ण पूंजी है। इसके बल पर काबिलीयत न होते हुए भी छात्र को सफलता प्राप्त करते देखा गया है। एकाग्रता की कमी से सबसे बडी परेशानी यह है कि आप अधिक देर तक टिक कर नहीं बैठ पाते। इसलिए आपको चाहिए कि बीस मिनट का लक्ष्य लेकर चलें। एकाग्रता दिमागी एक्सरसाइज है, इससे मस्तिष्क की ट्रेनिंग होती है। सबसे पहले अपने समय को नियमबद्ध करें। जो दिनचर्या तय की है यदि उस पर चलने की कोशिश सफल हुई है तो अपने को सराहें। इससे आगे के लिए प्रोत्साहन मिलेगा। यदि पढते-पढते थक गए या बोर हो रहे हैं तो अपने से बात करिए। यदि एकरसता से परेशान हो रहें हैं तो थोडा सा परिवर्तन लाने की कोशिश करें। अडिग नहीं थोडे लचीले बनें। ज्यादा सख्ती बेरुखी पैदा करती है। कहीं किताब खोलते ही मन घबराना न शुरू हो जाए। पढने के लिए शांत व व्यवस्थित जगह चुनें। कभी भी बेड पर या आरामकुर्सी पर बैठ कर न पढें, इससे आलस और नींद आती है। हमेशा सीधे बैठकर पढाई करें। न्यूयार्क में हाल में हुए अध्ययन से यह बात सामने आई कि चाय या कॉफी की जगह पानी पीना दिमागी विकास के लिए जरूरी है। इसलिए पानी खूब पिएं। जिस प्रकार वेटलिफ्टिंग से शरीर की ट्रेनिंग होती है उसी प्रकार दिमागी नियंत्रण के लिए योग और ध्यान भी जरूरी है।

अभिभावक के लिए

यह याद रखें कि उम्र के इस नाजुक दौर में किशोरों के लक्ष्य स्पष्ट नहीं होते तथा दिलो-दिमाग हकीकत में कम और कल्पना में ज्यादा रमते हैं। ऐसे में पेरेंट्स के सहयोग और सलाह की उन्हें बहुत जरूरत होती है।

2. दूसरी तरफ वे किशोर हैं जो प्रतिभाशाली व योग्य होने के बावजूद अति आत्मविश्वासी होने के कारण जानते हुए भी प्रश्नों के उत्तर गलत दे आते हैं। कक्षा में हमेशा प्रथम आने वाला हिमांशु जब बोर्ड की परीक्षा देकर बाहर निकला तो बहुत खुश था उसे सभी प्रश्नों के उत्तर मालूम थे। सारा पेपर उसे आता था। जब उत्तर मिलाने शुरू किए तो चेहरा उतरते देर नहीं लगी। असावधानीवश आते हुए जवाब भी उसने गलत दे दिए थे। क्योंकि क्या पूछा जा रहा है उसने समझा नहीं, शुरू की दो पंक्तियों को पढ कर ही जवाब लिख दिया।

छात्रों के लिए

इस उम्र में चिंता कम बेफिक्री ज्यादा होती है। ऐसे में अपने को व्यवस्थित रखना आना बहुत जरूरी है। पेपर सामने आने पर उसे सबसे पहले समय सीमा में बांधो। प्रश्न को एक बार नहीं दूसरी बार पढने के बाद हल करो। अपने मस्तिष्क को केंद्रित करने के लिए लगातार एक्सरसाइज करते रहो।

अभिभावकों के लिए

एकाग्रता के लिए सबसे अधिक जिम्मेदार अभिभावक ही होते हैं। घर पर किशोर अपना समय किस प्रकार कहां लगा रहा है व कितनी एकाग्रता से क्या कर रहा है यह देखना और समझना जरूरी है। उसे उसकी रुचि के काम या दिमागी कसरत वाले गेम में व्यस्त रखें। अधिक से अधिक पढने की आदत डालें। एकाग्रता के लिए इससे बेहतर एक्सरसाइज नहीं। ये कोर्स की किताबों की जगह, कहानी या उपन्यास भी हों तो कोई बात नहीं।

3. अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखना बहुत जरूरी है। इस उम्र में ध्यान भटकने की परेशानी बहुत होती है। पल में यहां तो पल में वहां विचार पहुंच जाते हैं। शालू का मसला भी ऐसा ही था, वह परीक्षा देने गई हिंदी की और पेपर था सोशल साइंस का। रोते-रोते दिमाग खराब हो गया। भले ही कोर्स पूरा तैयार हो लेकिन अंतिम तैयारी का भी तो कोई मतलब होता है। राहुल तो उससे भी आगे निकला बोर्ड की परीक्षा देने गया तो रोल नंबर घर ही भूल गया। यह सब घटनाएं दिमागी अस्थिरता की निशानी हैं। इसी क्रम में गजेन है, जो इंजीनियरिंग ड्राइंग की परीक्षा देने गया और जरूरी इंस्ट्रूमेंट ले जाना ही भूल गया। योग्य छात्र होने के कारण उसे अध्यापक से लेकर सहपाठियों तक ने सहयोग दिया, लेकिन इससे समय तो नष्ट हुआ ही।

छात्रों के लिए

हम जब बच्चों को अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखना सिखाते हैं तो सबसे पहला पाठ यही पढाते हैं कि अपने मूल्यों को समझो। भारतीय होने के कारण अपनी जडों से अलग होना आसान और सही निर्णय नहीं। क्रोध से बुद्धि का नाश होता है, सही निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित होती है। काम, क्रोध, लोभ और मोह को काबू में रखो। चीजों को बढा-चढाकर नहीं, उनके सही रूप में देखो और समझो। एक गलत कदम आगे के कितने कदमों को गलत करेगा यह इस उम्र में नहीं पता होता, लेकिन यह जानना जरूरी है।

अभिभावकों के लिए

सबसे ज्यादा परेशानी भावनाओं के मामले में इसलिए आ रही है क्योंकि किशोर अकेले होते जा रहे हैं। एकल परिवारों में पलने वाले और कामकाजी स्त्रियों के बच्चे अपने को अकेला महसूस करते हैं। उनकी भावनाओं को समझने और उन्हें जानने का वक्त पेरेंट्स के पास है ही नहीं। सबसे अनिवार्य कदम इस दिशा में यह होगा कि अभिभावक इस परेशानी को समझें व क्वालिटी टाइम बच्चे के साथ बिताएं।

4. इसी अकेलेपन से उपजती है पियर प्रेशर की समस्या। वेणी अकेली बच्ची होने के कारण अंतर्मुखी रही, किशोर हुई तो मां की नौकरी ने उसे और अकेला कर दिया। ऐसे में दोस्तों के सिवाय उसका कोई साथी ही नहीं था। जो दोस्त कहें वही अंतिम रूप से मान्य होता, भले ही गलत हो।

छात्रों के लिए

इस उम्र में शेयरिंग की समस्या से गुजरना आम है। हमसे आप बेझिझक बात करते हैं लेकिन अपने परिवारजन से बात करने में कतराते हैं। उनसे दोस्ती करने का प्रयास करें।

अभिभावकों के लिए

एक बच्चे की तुलना दूसरे से न करें। जब दो इंसानों की शक्ल एक सी नहीं होती तो अक्ल कैसे एक सी हो सकती है। हो सकता है कि एक बच्चा पढाई में अच्छा हो तो दूसरा अन्य किसी क्षेत्र में विलक्षण हो। इसे पहचान कर प्रोत्साहन देना भी आवश्यक है। सबसे जरूरी है कि आप किशोर होते बच्चे के दोस्त बनें। दोस्त बनते ही बहुत सी समस्याएं अपने आप आसानी से हल हो जाएंगी।

5. किसी विषय को लेकर मन में डर समाते भी इस उम्र में देखा जाता है। पल्लवी की मम्मी को स्कूल में बुला कर गणित के अध्यापक ने बताया कि न तो यह कक्षा कार्य ठीक से करती है और न ही गृहकार्य करके लाती है। पल्लवी अति संवेदनशील होने के कारण अपने कडक टीचर से तालमेल नहीं बैठा पा रही थी। जरा सी कोशिशों ने उसे कक्षा के योग्य छात्रों में ला खडा किया।

छात्रों के लिए

हर छात्र का अपना एप्टीटयूड होता है। जब हमारे पास कोई समस्या लेकर आता है तब हम सबसे पहले गलती की जड ढूंढते हैं। फोबिया होने की भी अलग-अलग वजह होती हैं। कई बार योग्यता का अभाव होता है तो कई बार अतिरिक्त योग्यता होने पर भी आप तालमेल नहीं बैठा पाते। इसके लिए गलती को समझना और गहराई से जानना जरूरी होता है।

अभिभावकों के लिए

अपनी संतान की बेहतरी के लिए जितने प्रयास आपको करने पडें कम हैं। उसके पास बैठिए और समझने की कोशिश करें कि कहां क्या कमी है जिसे सुधारा जा सकता है। यदि आप काउंसलर की सहायता लेना चाहते हैं तो भी आपके ब"ो के सारे विवरण होने जरूरी हैं।

न डरें बोर्ड परीक्षा से

दस से बारह साल तक अपने स्कूल में परीक्षा देने के स्थान पर बोर्ड परीक्षा के नाम से ही अकसर छात्रों के मन में डर हावी हो जाता है। यदि समझदारी से थोडी भी तैयारी की गई है तो डरने की जरूरत नहीं है। उत्तर पुस्तिका में आपकी राइटिंग साफ हो। हर उत्तर थोडा सा स्पेस देकर लिखें जिससे जांचकर्ता को समझने में कम से कम परेशानी हो। प्रश्न पत्र मिलने पर ध्यान से उसे पढें तथा समय के अनुरूप हर प्रश्न को बांट लें। अच्छी तरह आने वाले उत्तर पहले दें। यदि एक प्रश्न के कई भाग हैं तो सभी के उत्तर एक ही जगह दें। अंग्रेजी विषय को चार भागों में बांटा जाता है रीडिंग (पढना), राइटिंग (लेखन), ग्रामर (व्याकरण) और प्रोज (गद्य)। अकेले रीडिंग हिस्से के नंबर 34 हैं। यदि थोडी भी तैयारी हो तो पास होने का प्रतिशत सुरक्षित हो जाता है।

Monday, January 26, 2009

गीता से आत्मोन्नति

भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत के युद्ध के दौरान अर्जुन को जो उपदेश दिया था, वह आज हमारे लिए धर्म ग्रंथ है। और इस ग्रंथ में उन सभी महत्वपूर्ण बातों का उल्लेख है, जो मनुष्य के चारों पुरुषार्थो-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को दिशा निर्देशित करता है। इसके अलावा, इसमें भक्ति और कर्म की महत्ता का भी समन्वय किया गया है।

सबसे बडी बात तो यह है कि गीता में ईश्वर, जीव और प्रकृति के स्वरूप की व्याख्या जिस रूप में की गई है, उसे साधारण ज्ञान वाले व्यक्ति भी आसानी से समझ सकते हैं। यही वजह है कि कुछ विद्वान इसे कर्म-प्रधान धर्म ग्रन्थ कहते हैं, तो कुछ इसे ज्ञान प्रधान या भक्ति मार्ग का अद्भुत धर्म ग्रंथ बताते हैं।

वास्तव में, इसमें तीनों मार्गो को समाहित किया गया है। जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखी तिन तैसी वाली बात इस महान धर्म ग्रंथ के हर श्लोक में दिखाई पडती है। ध्यान दें कि गीता के कर्म मार्ग का उपदेश समाज के प्रत्येक व्यक्ति को प्रेरित करता है। श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं कि हे अर्जुन, यह जीवन हमारे किए गए कर्मो पर ही आधारित है, इसलिए कर्म करना प्रत्येक मानव का धर्म है। हमें सारी चिंताओं को त्यागकर अपने कर्तव्य-पालन में लग जाना चाहिए। दरअसल, कर्म मार्ग से ही वह ऊर्जा मिल सकती है, जो मनुष्य की सारी समस्याओं और कामनाओं को हल कर सकती है।

श्रीकृष्ण कहते हैं बिना कर्म किए कोई भी व्यक्ति मुक्ति, यानी आवागमन से छुटकारा नहीं प्राप्त कर सकता है। गीता में कहा गया है-

न कर्मणामनारम्भान्नैष्क‌र्म्यपुरुषौश्नुते।न चसंन्यसनादेवसिद्धि समधिगच्छति।अर्थात मनुष्य कभी भी कर्म से छुटकारा नहीं पा सकता है और न कर्म को त्यागकर उसे पूर्णता, यानी सिद्धि की प्राप्ति हो सकती है।

श्रीकृष्ण ने गीता में कर्म को केवल मनुष्य का धर्म नहीं माना है, बल्कि इसे योग भी कहा है। कहने का तात्पर्य यही है कि भगवत प्राप्ति के लिए कर्म एक साधना के समान है। जो लोग इसे साधना मानकर अपनाते हैं, वे न कभी भ्रमित होते हैं और न ही निराश होते हैं। अब प्रश्न यह उठता है कि कर्म करने के बाद हमें फल पाने की इच्छा जागृत हो जाती है, तो इस इच्छा से किस तरह से छुटकारा पाया जाए? इसका समाधान भी गीता में उपलब्ध है।

फल की इच्छा कर्म के बाद जगना एक स्वाभाविक-सी प्रक्रिया है, लेकिन एक सच यह भी है कि यह इच्छा ही इनसान को बंधन में डालती है और किसी भी चीज के प्रति आसक्तिपैदा करती है। इसलिए श्रीकृष्ण कहते हैं-यदि आवागमन से छुटकारा चाहते हो, तो आसक्तिका त्याग कर दो। आगे वे कहते हैं कि चूंकि यह मानव शरीर बडे भाग्य से मिला है, इसलिए इसे यज्ञ-मार्ग पर लगाना चाहिए, क्योंकि इससे न केवल तुम्हारी आसक्तिमिटेगी, बल्कि समाज का कल्याण भी होगा। साथ ही, आपकी आत्मा की उन्नति भी होगी। दरअसल, आत्म-उन्नति करना एक साधना और तप है और इससे ही हम परमात्मा से नजदीकी का अनुभव प्राप्त कर सकते हैं।

सच तो यह है कि कर्म-मार्ग वह अनुपम रास्ता है, जो आत्मा और परमात्मा को जोडने का कार्य करता है। कहने का तात्पर्य यही है कि मोक्ष प्राप्ति का सरल और सहज रास्ता कर्म मार्ग में ही निहित है। इसलिए कर्म करते वक्त हम आत्म-केंद्रित रहें, न कि इन्द्रियों के वश में। गीता के अनुसार, जो व्यक्ति इंद्रियों से वशीभूत होकर कर्म करता है, वह भगवत मार्ग का पथिक कभी भी नहीं बन सकता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति का यह कर्तव्य है कि अपनी आजीविका के लिए उसने जो कर्म चुना है, उसे पूरी ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा के साथ पूरा करे! दरअसल, मन की चंचलताको संयमित करके कर्म करने वालों को समाज में न केवल आदर-सम्मान मिलता है, बल्कि उसका जीवन भी सार्थक कहलाता है।

वीरता व बलिदान के प्रतीक गुरु

धर्म, संस्कृति व राष्ट्र की आन-बान और शान के लिए गुरु गोविन्द सिंह ने अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया। इतिहास में ऐसी वीरता और बलिदान कम ही देखने को मिलता है। इसके बावजूद इतिहासकारों ने इस महान शख्सियत को वह स्थान नहीं दिया जिसके वे हकदार हैं। इतिहासकार लिखते हैं कि गुरु गोविन्द सिंह ने अपने पिता का बदला लेने के लिए तलवार उठाई। जिस बालक ने स्वयं अपने पिता को आत्मबलिदान के लिए प्रेरित किया हो, क्या संभव है कि वह स्वयं लडने के लिए प्रेरित होगा?

गुरु गोविन्द सिंह को किसी से वैर नहीं था, उनके सामने तो पहाडी राजाओं की ईष्र्या पहाड जैसी ऊंची थी, तो दूसरी ओर औरंगजेबकी धार्मिक कट्टरता की आंधी लोगों के अस्तित्व को लीलरही थी। ऐसे समय में गुरु गोविन्द सिंह ने समाज को एक नया दर्शन दिया-आध्यात्मिक स्वतंत्रता की प्राप्ति के लिए तलवार धारण करना। जफरनामा में स्वयं गुरु गोविन्द सिंह लिखते हैं- जब सारे साधन निष्फल हो जायें, तब तलवार ग्रहण करना न्यायोचित है। धर्म एवं समाज की रक्षा हेतु ही गुरु गोविन्द सिंह ने 1699ई.में खालसा पंथ की स्थापना की। खालसा यानिखालिस (शुद्ध), जो मन, वचन एवं कर्म से शुद्ध हो और समाज के प्रति समर्पण का भाव रखता हो। उन्होंने सभी जातियों के वर्ग-विभेद को समाप्त कर न सिर्फ समानता स्थापित की बल्कि उनमें आत्म-सम्मान और प्रतिष्ठा की भावना भी पैदा की। उन्होंने स्पष्ट मत व्यक्त किया-मानस की जात सभैएक है।

गुरु नानक देव जी ने जहां विनम्रता और समर्पण पर जोर दिया था, वहीं गुरु गोविन्द सिंह ने आत्मविश्वास एवं आत्मनिर्भरता का संदेश दिया। समानता के आधार पर स्थापित खालसा पंथ में वे सिख थे, जिन्होंने किसी युद्ध कला का कोई विशेष प्रशिक्षण नहीं लिया था। सिखों में यदि कुछ था तो समाज एवं धर्म के लिए स्वयं को बलिदान करने का जज्बा।

गुरु गोविन्द सिंह का एक और उदाहरण उनके व्यक्तित्व को अनूठा साबित करता है-पांच प्यारे बनाकर उन्हें गुरु का दर्जा देकर स्वयं उनके शिष्य बन जाते हैं और कहते हैं-जहां पांच सिख इकट्ठे होंगे, वहीं मैं निवास करूंगा। खालसा मेरोरूप है खास, खालसा में हो करो निवास। सेनानायक के रूप में पहाडी राजाओं एवं मुगलों से कई बार संघर्ष किया। युद्ध के मैदान में उनकी उपस्थिति मात्र से सैनिकों में उत्साह एवं स्फूर्ति पैदा हो जाती थी। चण्डी चरित में लिखा सवैया शूरवीरों का मंत्र बन गया था-देह शिवा वर मोहिएहैभुभकरमनतेकबहूंन टरौ,न डरो अरि सो जब जाइलरोनिसचैकर अपनी जीत करो।

जहां शिवाजी राजशक्ति के शानदार प्रतीक हैं, वहीं गुरु गोविन्द सिंह एक संत और सिपाही के रूप में दिखाई देते हैं। क्योंकि गुरु गोविन्द सिंह को न तो सत्ता चाहिए और न ही सत्ता सुख। उनका विषय तो शान्ति एवं समाज कल्याण था। अपने माता-पिता, पुत्रों और हजारों सिखों के प्राणों की आहुति देने के बाद भी वह औरंगजेबको फारसी में लिखे अपने पत्र जफरनामा में लिखते हैं- औररंगजेब तुझे प्रभु को पहचानना चाहिए तथा प्रजा को दु:खी नहीं करना चाहिए। कुरान की कसम खाकर तूने कहा था कि मैं सुलह रखूंगा, लडाई नहीं करूंगा, यह कसम तुम्हारे सिर पर भार है। तू अब उसे पूरा कर। गुरु गोविंद सिंह एक आध्यात्मिक गुरु के अतिरिक्त एक महान विद्वान भी थे। उन्होंने पाउन्टासाहिब के अपने दरबार में 52कवियों को नियुक्त किया था। जफरनामा एवं विचित्र नाटक गुरु गोविन्द सिंह की महत्वपूर्ण कृतियां हैं। वह स्वयं सैनिक एवं संत थे। इसी भावनाओं का पोषण उन्होंने अपने सिखों में भी किया। सिखों के बीच गुरु गद्दी को लेकर कोई विवाद न हो इसके लिए उन्होंने गुरुग्रन्थ साहिब को गुरु का दर्जा दिया। इसका श्रेय भी प्रभु को देते हुए कहते हैं-आज्ञा भई अकाल की तभी चलाइयोपंथ, सब सिक्खनको हुकम है गुरू मानियहुग्रंथ।

गुरुनानक की दसवीं जोत गुरु गोविंद सिंह अपने जीवन का सारा श्रेय प्रभु को देते हुए कहते है-मैं हूं परम पुरखको दासा, देखन आयोजगत तमाशा। ऐसी शख्सियत को शत-शत नमन।

Saturday, January 17, 2009

स्वप्न में मित्र की मृत्यु का पूर्वाभास

कई परामनोविज्ञान वेत्ता मानते हैं कि स्वप्न जगत परलोक व इहलोक का मिलन स्थल है। भाव जगत समय और स्थान की सीमा में नहीं बंधा है। पराचेतना चौथे आयाम के संसार में सब कुछ देख सकती है और एक ही क्षण में सृष्टि के आरंभ से अंत तक निगाह दौडा कर भूत, भविष्य व वर्तमान को जान सकती है। सपने में अवचेतन मन भावी घटनाओं का पूर्वाभास कर लेता है। यह बात बहुत पहले की है। रोज की तरह मैं उस रात भी अपना लेखन कार्य समाप्त कर सो गया। नींद में मैंने एक विचित्र सपना देखा। महल जैसा एक भव्य भवन है। उसके ठीक सामने विशाल उद्यान था। मैं और मेरा करीबी मित्र उस उद्यान में जाने के लिए बने राजमार्ग पर चल रहे हैं। हम दोनों शांत एवं निर्विकार भाव से चल रहे थे। मित्र के मुख पर विषाद की रेखाएं थीं। हम एक ऐसे स्थान पर पहुंचे जहां दो छोर नजर आ रहे थे। जिसके एक ओर प्रकाश था दूसरी ओर अंधकार। यहां आकर मित्र ने मुझे विदा किया। उसके पश्चात वह मित्र उस गहन अंधकार में जाकर न जाने कहां विलीन हो गया। दूसरे दिन प्रात: काल मैंने इस सपने का पूरा ब्यौरा अपनी डायरी में नोट कर लिया। मैंने अपने मित्र को इस सपने का पूरा वृत्तांत भी पत्र द्वारा लिखकर बताया। पत्र का उत्तर मित्र के भाई ने दिया था। जिसमें लिखा था कि छोटे भाई (उस मित्र की) की मृत्यु अचानक हो गई। आश्चर्य की बात यह थी कि उसकी मृत्यु ठीक उसी दिन और उसी समय पर हुई थी, जिस समय मैंने अपनी डायरी में उस सपने की घटना को लिखा। इसी प्रकार एक बार रात के अंतिम प्रहर में मैंने सपने में एकविमान की भूमि से जोरदार टक्कर देखी व कर्कश ध्वनि सुनी। ठीक दूसरे दिन सुबह समाचार पत्र में पढा कि चीन में एक विमान दुर्घटना में डेढ सौ व्यक्ति मारे गए।

विश्लेषण

डा. श्याम मनोहर व्यास के अतींद्रिय अनुभव मुख्यत: सपनों से जुडे हुए हैं। सपने का आरंभ सामान्य ढंग से हुआ, लेकिन बाद में कुछ परिवर्तन हुए। मित्र के चेहरे पर विषाद उभरना व्यक्ति के अंदर के डर का प्रतीक है। सपने में अंधकार में खो जाने का संकेत मृत्यु से जुडा हुआ है। शास्त्रों के अनुसार मृत्यु के समय व्यक्ति तीन अवस्थाओं से गुजरता है। मृत्यु की पहली अवस्था में शारीरिक और मानसिक यंत्रणा महसूस होती है। धीरे-धीरे पीडा समाप्त होकर चेहरे पर शांति छा जाती है। यह शरीर की मृत्यु होती है। लेकिन इसके बाद भी मस्तिष्क काम करता रहता है। बाहरी चेतना खत्म हो जाने के बाद भी आंतरिक चेतना बनी रहती है। धीरे-धीरे यह चेतना भी खत्म होने लगती है तथा दूसरी अवस्था का अंत होकर मस्तिष्क की भी मृत्यु हो जाती है। तीसरी अवस्था में आत्मा अपने शरीर को अपने से अलग देखती व महसूस करती है। तमाम अनुसंधानों के बाद ज्ञात हुआ है कि तीसरी अवस्था में दिवंगत आत्मा अपने आत्मबल के अनुसार दो घंटे से लेकर दस दिन, तेरह दिन, 45 दिन तथा 1 साल तक रह सकती है। पहले दो घंटे का समय दिवंगत आत्मा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। उसमें अपने शरीर के लिए प्रबल आकर्षण तथा पुन: शरीर धारण करने की भावना बलवती होती है। इसके बाद 10 दिन की अवधि में दिवंगत आत्मा का अपने परिवार से अगोचर संबंध बना रहता है। कई बार मुक्ति में 13 दिन अथवा एक वर्ष का समय भी लग जाता है। इसीलिए तेहरवीं और बरसी का विधान है। सूक्ष्म शरीर में प्रवेश से पहले अकसर आत्मा उन लोगों को देखना चाहती है, जिनसे उसका प्रबल लगाव होता है। इसी कारण डा.श्याम मनोहर व्यास के मित्र उन्हें दिखाई दिए। इसका एहसास उन्हें सपने के माध्यम से हुआ। इस प्रकार के अनुभव मृत्यु के बाद दो घंटे से लेकर 10 दिन, 13 दिन अथवा वर्ष भर तक हो सकते हैं। यदि किसी कारणवश आत्मा की मुक्ति न हो तो यह अनुभव लंबे समय तक हो सकते हैं।

Saturday, January 10, 2009

श्रीहनुमानचालीसा

श्रीहनुमानचालीसा

दोहा

श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।

बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥

बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।

बल बुधि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार॥

चौपाई

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥

राम दूत अतुलित बल धामा। अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा॥

महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी॥

कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुंडल कुंचित केसा॥

हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै। काँधे मूँज जनेऊ साजै॥

संकर सुवन केसरीनंदन। तेज प्रताप महा जग बंदन॥

बिद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर॥

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया॥

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। बिकट रूप धरि लंक जरावा॥

भीम रूप धरि असुर सँहारे। रामचन्द्र के काज सँवारे॥

लाय सजीवन लखन जियाये। श्रीरघुबीर हरषि उर लाये॥

रघुपति कीन्ही बहुत बडाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥

सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा॥

जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते। कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते॥

तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राज पद दीन्हा।

तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना। लंकेस्वर भए सब जग जाना॥

जुग सहस्त्र जोजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माही। जलधि लाँधि गये अचरज नाहीं॥

दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥

राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥

सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रच्छक काहू को डर ना॥

आपन तेज सम्हारो आपै। तीनों लोक हाँक तें काँपै॥

भूत पिसाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै॥

नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा॥

संकट तें हनुमान छुडावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥

सब पर राम तपस्वी राजा। तिन के काज सकल तुम साजा॥

और मनोरथ जो कोइ लावै। सोइ अमित जीवन फल पावै॥

चारों जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा॥

साधु संत के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे॥

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता॥

राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा॥

तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै॥

अंत काल रघुबर पुर जाई। जहाँ जन्म हरि-भक्त कहाई॥

और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेइ सर्ब सुख करई॥

संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥

जै जै जै हनुमान गोसाई। कृपा करहु गुरु देव की नाई॥

जो सत बार पाठ कर कोई। छूटहि बंदि महा सुख होई॥

जो यह पढै हनुमान चलीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा॥

तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय महँ डेरा॥

दोहा

पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।

राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥



------------------------------------ श्री संकटमोचन हनुमानाष्टक



मत्तगयन्द छन्द

बाल समय रबि लियो तब तीनहुँ लोक भयो अँधियारो।

ताहि सों त्रास भयो जग को यह संकट काहु सों जात न टारो॥

देवन आनि करी बिनती तब छाँडि दियो रबि कष्ट निवारो।

को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो॥1॥

बालि की त्रास कपीस बसे गिरि जात महाप्रभु पंथ निहारो।

चौंकि महा मुनि साप दियो तब चाहिय कौन बिचार बिचारो॥

कै द्विज रूप लिवाय महाप्रभु सो तुम दास के सोक निवारो॥2॥ को नहिं.

अंगद के सँग लेन गये सिय खोज कपीस यह बैन उचारो।

जीवत ना बचिहौ हम सो जु बिना सुधि लाए इहाँ पगु धारो॥

हरि थके तट सिंधु सबै तब लाय सिया-सुधि प्रान उबारो॥3॥ को नहिं..

रावन त्रास दई सिय को सब राक्षसि सों कहि सोक निवारो।

ताहि समय हनुमान महाप्रभु जाय महा रजनीचर मारो॥

चाहत सीय असोक सों आगि सु दै प्रभु मुद्रिका सोक निवारो॥4॥ को नहिं..

बान लग्यो उर लछिमन के तब प्रान तजे सुत रावन मारो।

लै गृह बैद्य सुषेन समेत तबै गिरि द्रोन सु बीर उपारो॥

आनि सजीवन हाथ दई तब लछिमन के तुम प्रान उबारो॥5॥ को नहिं..

रावन जुद्ध अजान कियो तब नाग की फाँस सबे सिर डारो।

श्रीरघुनाथ समेत सबै दल मोह भयो यह संकट भारो॥

आनि खगेस तबै हनुमान जु बंधन काटि सुत्रास निवारो॥6॥ को नहिं..

बंधु समेत जबै अहिरावन लै रघुनाथ पताल सिधारो।

देबिहिं पूजि भली बिधि सों बलि देउ सबै मिलि मंत्र बिचारो॥

जाय सहाय भयो तब ही अहिरावन सैन्य समेत सँहारो॥7॥ को नहिं..

काज किये बड देवन के तुम बीर महाप्रभु देखि बिचारो।

कौन सो संकट मोर गरीब को जो तुमसों नहिं जात है टारो॥

बेगि हरो हनुमान महाप्रभु जो कछु संकट होय हमारो॥8॥ को नहिं..

दोहा :- लाल देह लाली लसे, अरु धरि लाल लँगूर।

बज्र देह दानव दलन, जय जय जय कपि सूर॥

Friday, January 2, 2009

समय के साथ चलें

घर के बडे-बुजुर्ग हमेशा हमें समय की कीमत पहचानने व वक्त के साथ चलने की नसीहत देते हैं। जो समय से पिछड जाता है वह अपने जीवन में कुछ खास हासिल नहीं कर पाता।

समय की गणना या समय को प्रदर्शित करने वाले विभिन्न उपकरणों को मनुष्य ने आदिकाल से अपनाया है। पहले सूर्य की स्थिति के अनुसार या फिर धूप की परछाई देखकर समय का अनुमान लगाया जाता था। टाइम मशीन, सन डायल, जंतर-मंतर आदि सभी कुछ पुराने जमाने में समय की गणना करने वाले विभिन्न यंत्रों के उदाहरण हैं। अति प्राचीन वैदिक विज्ञान में भी समय प्रदर्शित करने वाले विभिन्न उपकरणों की दिशा का वर्णन किया गया है। इसलिए यह स्वयंसिद्ध है कि यदि आप घडी का सकारात्मक ढंग से प्रयोग करें तो हर बार समय देखते समय आपको सकारात्मक ऊर्जा की प्राप्ति होगी। एक लंबे समय तक सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त करने का अर्थ होगा सही समय पर पूरे परिवार का सही विकास। अगर आप अपने घर में घडी जैसी समय सूचक वस्तु को व्यवस्थित करते समय वास्तुशास्त्र के इन सिद्धांतों का ध्यान रखेंगी तो यह आपके परिवार के लिए निश्चित रूप से फायदेमंद साबित होगा :

1. घडी को दीवार पर लगाने के लिए उत्तर, पूर्व एवं पश्चिम दिशा का ही चुनाव करें। कभी भी दक्षिण दिशा की दीवार पर घडी न लगाएं। यदि घडी दक्षिण दिशा की दीवार पर लगी होगी तो कार्य प्रारंभ करने से पहले व दिन में कई बार आपका ध्यान दक्षिण दिशा की ओर जाएगा। इस तरह आप बार-बार दक्षिण दिशा की ओर से आने वाली नकारात्मक ऊर्जा ही प्राप्त करती रहेंगी।

2. घडियों के प्रयोग में एक दूसरी विशेष सावधानी यह भी रखनी चाहिए कि किसी भी तरह की घडी चाहे वह टाइम पीस हो या फिर दीवार घडी इन्हें रात को सोते समय सिरहाने से थोडी दूरी पर ही रखें, क्योंकि रात के सन्नाटे में घडी की टिक-टिक से नींद में विघ्न पडेगा। साथ ही आजकल घडियां प्राय: इलेक्ट्रॉनिक सिद्धांत पर कार्य करती हैं और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से जो इलेक्ट्रो-मैग्नेनिटक रेडिएशन निकलते हैं वे मस्तिष्क व हृदय के आसपास एक नकारात्मक ऊर्जा क्षेत्र बना देते हैं। इसके प्रभाव में सोना या लेटना आपके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर डाल सकता है।

3.यह ध्यान रखें कि घडी कभी भी किसी दरवाजे के ऊपर न हो क्योंकि हर बार दरवाजे से अंदर बाहर आते-जाते समय आपका आभामंडल इससे दुष्प्रभावित होगा। परिणामस्वरूप आप तनावग्रस्त हो सकते हैं। यहां तक कि ऐसे दरवाजे से बाहर निकलने के बाद भी मन खिन्न रहेगा।

4.इस बात का हमेशा ध्यान रखें कि घर में मौजूद सभी घडियां सही ढंग से चलती रहें। कोई भी घडी बंद नहीं होनी चाहिए।

5. यह भी याद रखें कि कोई भी घडी अपने समय से पीछे न चले। हो सके तो अपनी घडी को सही समय से पांच-दस मिनट आगे ही रखें क्योंकि वक्त के साथ चलने में ही जीवन की गति, उन्नति व विकास का रहस्य छिपा है।

6. खराब घडी को शीघ्र ही ठीक करवाएं एवं बैटरी खराब होने पर उसे बदलवाती रहें।

7.आजकल कुछ घडियां हर एक घंटे के बाद संगीत या मधुर ध्वनियां उत्पन्न करती हैं। ऐसी घडियों को घर के ब्रह्म स्थान स्थित लॉबी में लगाएं। इससे सकारात्मक ऊर्जा में वृद्धि होती है व परिवार के सभी सदस्यों के जीवन में उन्नति के नए अवसर प्राप्त होते हैं।

8. दीवार घडी पर धूल-मिट्टी जमा न होने दें। नियमित रूप से उसकी सफाई करती रहें।

9. यह ध्यान रखें कि किसी भी घडी का शीशा टूटा हुआ न हो। ऐसी टूटी हुई घडी को बदल देना चाहिए क्योंकि इसका परिवार के सदस्यों पर नकारात्मक प्रभाव पडता है।

10. सिर्फ घडी ही नहीं, बल्कि कैलेंडर जैसी समय सूचक वस्तु के संबंध में भी आपको इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि कैलेंडर फटा हुआ न हो, उस पर कोई अश्लील या हिंसक चित्र भी नहीं होना चाहिए। हर महीने कैलेंडरकी तारीख बदलती रहें और पुराना होते ही उसे हटा दें।