Monday, January 9, 2012
सवा लाख से एक लड़ाऊं
गुरु गोविंद सिंह जी से प्रेरणा लेकर कोई भी उच्चतम जीवन उद्देश्यों को प्राप्त कर सकता है। उनका जन्मदिन प्रकाश पर्व [नानकशाही कैलेंडर के अनुसार 31दिसंबर] के रूप में मनाया जाता है..
गुरु गोविंद सिंह जी का जीवन बहुपक्षीय एवं बहुआयामी था। उनसे प्रेरित होकर मनुष्य न सिर्फ जीवन के उच्चतम उद्देश्यों को प्राप्त कर सकता है, बल्कि जीवन की आम समस्याओं से निपटने के लिए भी मार्गदर्शन हासिल कर सकता है।
संत-सिपाही :गुरु जी संत भी थे और सिपाही भी। उन्होंने हमेशा गरीबों-पीडितों की रक्षा और अत्याचार के विरोध के लिए ही तलवार उठाई। औरंगजेबके सिपहसालार सैदखां से युद्ध करते समय जब गुरु जी ने उस पर वार किया, तो वह घायल होकर गिर पडा। गुरु जी ने अपनी ढाल से उस पर छाया की और मरहम-पट्टी का प्रबंध भी किया। कहा जाता है कि गुरु जी के तीरों में सोना मढा होता था, ताकि मरने वाले को अंतिम संस्कार का सामान मिल सके और यदि वह घायल होता है, तो उसे इलाज का खर्च मिल सके। गुरु जी का यह उच्च आचरण मनुष्य को सिखाता है कि परिस्थितियां कितनी भी विपरीत हों, मानवीय मूल्यों को कभी नहीं भूलना चाहिए।
समता के सरपरस्त :गुरु गोविंद सिंह जी का सारा संघर्ष मानवता की रक्षा के लिए था। उन्होंने दबे-कुचले लोगों को एकत्र कर खालसा का सृजन कर ऐसी शक्तिशाली सेना तैयार की, जिसने अपने समय की सबसे बडी सैनिक शक्तियों को परास्त किया। चिडियन तेमैं बाज तुडाऊं और सवा लाख से एक लडाऊं का घोष करके गुरु जी ने जनता की उस सोई शक्ति को जगा दिया, जो अपने सम्मान और अधिकारों की रक्षा के लिए बडी से बडी ताकत से भिडने में समर्थ है। यही नहीं, गुरु जी ने इनहिंते राजेउपजाऊं कहकर शक्तिहीन जनता को राजनीतिक शक्ति हासिल करने लायक भी बनाया। उनका संदेश है कि सभी मनुष्य समान हैं और व्यवस्थाओं में उनकी भागीदारी बराबर है।
आध्यात्मिक नेतृत्व :गुरु गोविंद सिंह जी ने मनुष्य को आदर्श आचरण धारण करने के लिए प्रतिबद्ध किया। गुरु जी द्वारा प्रदत्त पांच ककार उच्च एवं आदर्श जीवन के प्रतीक हैं। केश श्रेष्ठ चिंतन, कृपाण शक्ति, कछहरा सदाचार, कडा संयम और कंघा स्वच्छता एवं निर्मलता का प्रतीक है।
कवि एवं भाषाविद :अकाल उसतति,जापु साहिब, जफरनामा जैसी कृतियों के रचयिता गुरु गोविंद सिंह जी कवियों एवं विद्वानों का बहुत आदर करते थे। उनके विद्या दरबार में 52कवियों समेत सर्वाधिक विद्वान थे जो निरंतर साहित्य-सृजन में लगे रहते थे।
सर्ववंशबलिदानी :गुरु जी के परदादा पंचम पातशाहगुरु अर्जुन देव जी ने शहीदी देकर बलिदान परंपरा शुरू की। गुरु जी के पिता नवम गुरु श्री गुरु तेग बहादुर जी ने चांदनी चौक में शीश दिया। गुरु जी के चारों साहिबजादेभी मानवता की रक्षा हेतु कुर्बान हुए। गुरु गोविंद सिंह जी ने सिद्ध कर दिया कि सत्य और मानवता की रक्षा के लिए बलिदान करना पडे, तो पीछे नहीं हटना चाहिए।
Friday, August 12, 2011
सोने का हिंडोला और श्रद्धा की डोर
बादलों की लुका-छिपी के साथ कडी धूप व उमस भरी गर्मी भी लाखों श्रद्धालुओं की आस्था को डिगा नहीं पायी। उन्होंने स्वर्ण-रजत निर्मित हिंडोले में विराजमान बांके बिहारी को श्रद्धा व विश्वास की डोर से झुलाया। मंदिर के पट खुलते ही वातावरण प्रभु की जय-जयकार से गूंज उठा।
नयनाभिराम दर्शनों की अभिलाषा लेकर वृंदावन आये भक्तों का हृदय पट खुलते ही आनंद के सागर में हिलोरेंमारने लगा। देशी-विदेशी पुष्पों की सुगंध आत्मविभोर करती रही। श्रद्धालुओं दबाव दर्शन खुलने के साथ से पट बंद होने तक बराबर बना रहा। यूं पहले से कम भीड रही, परंतु पांच लाख श्रद्धालुओं के आने का अनुमान लगाया जा रहा है। दुसायतस्थित राधासनेहबिहारी मंदिर में ठाकुर जी स्वर्ण-रजत हिंडोले में विराजे। राधा दामोदर मंदिर, राधाबल्लभमंदिर, राधारमणमंदिर, राधाबिहारी,लालाबाबूमंदिर समेत अनेक देवालयों में हजारों श्रद्धालु झूलनोत्सवके दर्शनार्थ उमडे। अनेक समाजसेवी संस्थाओं ने श्रद्धालुओं की सुविधार्थ शीतल जल की प्याऊ लगायीं।
श्री वृन्दावन विकास समिति ने बिहारी जी पुलिस चौकी पर खोया-पाया शिविर लगाया। बसेरा गु्रप ने अटल्लाचुंगी पर श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया। बसेरा गु्रप चेयरमैन रामकिशन अग्रवाल ने वितरण शिविर का आरंभ किया।
करहआश्रम में तीज पर ठा.सीताराम महाराज का झूलन उत्सव महंत वैष्णव दास के सान्निध्य में मना। शुभारम्भ महंत धर्मदास ने दीप प्रज्ज्वलन कर किया। इस अवसर पर सच्चिदानंद दास, राधिका दास, बिहारीलाल वशिष्ठ, संतदासउपस्थित थे। संचालन प्रबंधक भगत ने किया।
ठाकुर जी ने किया सुखसेजपर विश्राम
बांकेबिहारीमहाराज हिंडोले में दर्शन देने के उपरांत रात्रि विश्राम, वर्ष में एक दिन ही सजने वाली सुख सेज पर किया। जहां पान का बीडा, रजत कलश में जल, रजत कंघी, आदमकद रजत आईनेएवं लड्डू आदि रखे जाते हैं।
नयनाभिराम दर्शनों की अभिलाषा लेकर वृंदावन आये भक्तों का हृदय पट खुलते ही आनंद के सागर में हिलोरेंमारने लगा। देशी-विदेशी पुष्पों की सुगंध आत्मविभोर करती रही। श्रद्धालुओं दबाव दर्शन खुलने के साथ से पट बंद होने तक बराबर बना रहा। यूं पहले से कम भीड रही, परंतु पांच लाख श्रद्धालुओं के आने का अनुमान लगाया जा रहा है। दुसायतस्थित राधासनेहबिहारी मंदिर में ठाकुर जी स्वर्ण-रजत हिंडोले में विराजे। राधा दामोदर मंदिर, राधाबल्लभमंदिर, राधारमणमंदिर, राधाबिहारी,लालाबाबूमंदिर समेत अनेक देवालयों में हजारों श्रद्धालु झूलनोत्सवके दर्शनार्थ उमडे। अनेक समाजसेवी संस्थाओं ने श्रद्धालुओं की सुविधार्थ शीतल जल की प्याऊ लगायीं।
श्री वृन्दावन विकास समिति ने बिहारी जी पुलिस चौकी पर खोया-पाया शिविर लगाया। बसेरा गु्रप ने अटल्लाचुंगी पर श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया। बसेरा गु्रप चेयरमैन रामकिशन अग्रवाल ने वितरण शिविर का आरंभ किया।
करहआश्रम में तीज पर ठा.सीताराम महाराज का झूलन उत्सव महंत वैष्णव दास के सान्निध्य में मना। शुभारम्भ महंत धर्मदास ने दीप प्रज्ज्वलन कर किया। इस अवसर पर सच्चिदानंद दास, राधिका दास, बिहारीलाल वशिष्ठ, संतदासउपस्थित थे। संचालन प्रबंधक भगत ने किया।
ठाकुर जी ने किया सुखसेजपर विश्राम
बांकेबिहारीमहाराज हिंडोले में दर्शन देने के उपरांत रात्रि विश्राम, वर्ष में एक दिन ही सजने वाली सुख सेज पर किया। जहां पान का बीडा, रजत कलश में जल, रजत कंघी, आदमकद रजत आईनेएवं लड्डू आदि रखे जाते हैं।
Sunday, June 12, 2011
चलो शिव-शंभू के धाम
कैलास-मानसरोवर यात्रा आज से दिल्ली से शुरू हो रही है। कैलास पर्वत को ही भगवान शिव का धाम माना जाता है। वहां तक पहुंचने की इस यात्रा में होता है आस्था, आध्यात्मिकता और रोमांच का समागम..
कैलास मानसरोवर यात्रा में हुई अनुभूति का शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता। कैलाश पर्वत की परिक्रमा के दौरान मन पर्वत की नैसर्गिकताऔर दिव्यता से जुड जाता है। श्रद्धापूरितमन जैसा स्मरण करता है, शिवमययह पर्वत उसे वैसा ही रूप दिखा देता है।- पिछले वर्ष 2010में कैलास-मानसरोवर की यात्रा पर गए महंत केशव गिरि इस यात्रा से अभिभूत होकर अपनी अनुभूति इस प्रकार व्यक्त करते हैं। वे कहते हैं, यह यात्रा बेशक लंबी और काफी कठिन मार्गो से होकर गुजरती है, लेकिन यह मन को आनंदित करने वाली होती है। जून से सितंबर तक चलने वाली इस यात्रा में सैकडों यात्री तिब्बत पहुंचकर आराध्य महादेव शिव के धाम का दर्शन करते हैं। कैलास-मानसरोवर यात्रा मात्र आस्था ही नहीं, बल्कि यात्रा के रोमांच के लिए भी प्रसिद्ध है। दो देशों द्वारा संचालित होने वाली इस यात्रा में देश के विभिन्न प्रांतों से लोग एक-साथ इस यात्रा पर जाते हैं, इसलिए उनके बीच भाईचारा भी बढता है। मान्यता है कि कैलास-मानसरोवर शिव का धाम है।
विचारक बीडीकसनियालकहते हैं कि ध्यान और तप के देवता शिव हैं। शिव के अनुयायी मुक्ति का मार्ग ध्यान और तपस्या को ही मानते हैं। पूरा हिमालय शिव की भूमि है। कैलास पर्वत को ही उनका आवास माना जाता है। भगवान शिव का धाम कैलास-मानसरोवर तिब्बत में पडता है। तिब्बत इस समय चीन के आधिपत्य में है। जिस कारण यात्रियों को पासपोर्ट, वीजा, स्वास्थ्य परीक्षण जैसी प्रक्रियाओं से गुजरना पडता है।
इस धार्मिक यात्रा का जिम्मा कुमाऊं मंडल विकास निगम को दिया गया है। यात्रा दिल्ली से शुरू होकर काठगोदाम, अल्मोडा, पिथौरागढहोते हुए आधार शिविर धारचूलापहुंचती है। जहां से दो घंटे की यात्रा वाहन से करने के बाद यात्रा के पैदल पडाव तय किए जाते हैं। इन पडावों पर याक पशु भी किराये पर किया जा सकता है। प्रत्येक यात्री को दिल्ली और गुंजीपडाव पर स्वास्थ्य परीक्षण से गुजरना होता है। सफल यात्री ही कैलाश-मानसरोवर के दर्शन कर पाते हैं। कैलाश-मानसरोवर की परिक्रमा का जिम्मा चीन सरकार का रहता है। परिक्रमा कर वापस दिल्ली लौटने में 28दिन का समय लगता है।
कैलास मानसरोवर यात्रा में हुई अनुभूति का शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता। कैलाश पर्वत की परिक्रमा के दौरान मन पर्वत की नैसर्गिकताऔर दिव्यता से जुड जाता है। श्रद्धापूरितमन जैसा स्मरण करता है, शिवमययह पर्वत उसे वैसा ही रूप दिखा देता है।- पिछले वर्ष 2010में कैलास-मानसरोवर की यात्रा पर गए महंत केशव गिरि इस यात्रा से अभिभूत होकर अपनी अनुभूति इस प्रकार व्यक्त करते हैं। वे कहते हैं, यह यात्रा बेशक लंबी और काफी कठिन मार्गो से होकर गुजरती है, लेकिन यह मन को आनंदित करने वाली होती है। जून से सितंबर तक चलने वाली इस यात्रा में सैकडों यात्री तिब्बत पहुंचकर आराध्य महादेव शिव के धाम का दर्शन करते हैं। कैलास-मानसरोवर यात्रा मात्र आस्था ही नहीं, बल्कि यात्रा के रोमांच के लिए भी प्रसिद्ध है। दो देशों द्वारा संचालित होने वाली इस यात्रा में देश के विभिन्न प्रांतों से लोग एक-साथ इस यात्रा पर जाते हैं, इसलिए उनके बीच भाईचारा भी बढता है। मान्यता है कि कैलास-मानसरोवर शिव का धाम है।
विचारक बीडीकसनियालकहते हैं कि ध्यान और तप के देवता शिव हैं। शिव के अनुयायी मुक्ति का मार्ग ध्यान और तपस्या को ही मानते हैं। पूरा हिमालय शिव की भूमि है। कैलास पर्वत को ही उनका आवास माना जाता है। भगवान शिव का धाम कैलास-मानसरोवर तिब्बत में पडता है। तिब्बत इस समय चीन के आधिपत्य में है। जिस कारण यात्रियों को पासपोर्ट, वीजा, स्वास्थ्य परीक्षण जैसी प्रक्रियाओं से गुजरना पडता है।
इस धार्मिक यात्रा का जिम्मा कुमाऊं मंडल विकास निगम को दिया गया है। यात्रा दिल्ली से शुरू होकर काठगोदाम, अल्मोडा, पिथौरागढहोते हुए आधार शिविर धारचूलापहुंचती है। जहां से दो घंटे की यात्रा वाहन से करने के बाद यात्रा के पैदल पडाव तय किए जाते हैं। इन पडावों पर याक पशु भी किराये पर किया जा सकता है। प्रत्येक यात्री को दिल्ली और गुंजीपडाव पर स्वास्थ्य परीक्षण से गुजरना होता है। सफल यात्री ही कैलाश-मानसरोवर के दर्शन कर पाते हैं। कैलाश-मानसरोवर की परिक्रमा का जिम्मा चीन सरकार का रहता है। परिक्रमा कर वापस दिल्ली लौटने में 28दिन का समय लगता है।
Sunday, May 29, 2011
कालेश्वर में स्नान करने से मिलता है पांचों तीर्थो का फल
कालेश्वरकाअर्थ है कालस्यईश्वरयानी काल का स्वामी। उज्जैनकेमहाकाल मंदिर के बाद कालेश्वरएकमात्रऐसा मंदिर है जिसके गर्भ गृह में ज्योर्तिलिंगस्थापितहै। यहां भगवान शिव एक अद्भुत लिंगरूपमेंविराजमान हैं।
कालेश्वरमेंस्थित कालीनाथमंदिरका इतिहास पांडवों जुडाहै। जनश्रुतिकेअनुसार इस स्थल पर पांडव अज्ञातवास के दौरान आए थे और इसका प्रमाण ब्यासनदीके तट पर उनके द्वारा बनाई गई पौडियोंसेमिलता है। बताया जाता है कि पांडव जब यहां आए तो भारत के पांच प्रसिद्ध तीथरेंहरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन,नासिकव रामेश्वरमकाजल अपने साथ लाए थे और जल को यहां स्थित तालाब में डाल दिया था जिसे पंचतीर्थीकेनाम से जाना जाता है। तबसे पंचतीर्थीतथा व्यास नदी में स्नान को हरिद्वार में स्नान के तुल्य माना गया है।
किवदंतीकेअनुसार महर्षि व्यास ने यहां घोर तपस्या की थी। इसका प्रमाण इस स्थल पर स्थित ऋषि-मुनियों की समाधियां से मिलता है। मंदिर का निर्माण पांडवों, कुटलैहडएवंजम्मू की महारानी व राजा गुलेरनेकरवाया था। इस तीर्थ स्थल के साथ महाकाली के विचरण का महात्म्यभीजुडाहै।
कालेश्वरमेंस्थित कालीनाथमंदिरका इतिहास पांडवों जुडाहै। जनश्रुतिकेअनुसार इस स्थल पर पांडव अज्ञातवास के दौरान आए थे और इसका प्रमाण ब्यासनदीके तट पर उनके द्वारा बनाई गई पौडियोंसेमिलता है। बताया जाता है कि पांडव जब यहां आए तो भारत के पांच प्रसिद्ध तीथरेंहरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन,नासिकव रामेश्वरमकाजल अपने साथ लाए थे और जल को यहां स्थित तालाब में डाल दिया था जिसे पंचतीर्थीकेनाम से जाना जाता है। तबसे पंचतीर्थीतथा व्यास नदी में स्नान को हरिद्वार में स्नान के तुल्य माना गया है।
किवदंतीकेअनुसार महर्षि व्यास ने यहां घोर तपस्या की थी। इसका प्रमाण इस स्थल पर स्थित ऋषि-मुनियों की समाधियां से मिलता है। मंदिर का निर्माण पांडवों, कुटलैहडएवंजम्मू की महारानी व राजा गुलेरनेकरवाया था। इस तीर्थ स्थल के साथ महाकाली के विचरण का महात्म्यभीजुडाहै।
Tuesday, May 10, 2011
कालेश्वर में स्नान करने से मिलता है पांचों तीर्थो का फल
कालेश्वरकाअर्थ है कालस्यईश्वरयानी काल का स्वामी। उज्जैनकेमहाकाल मंदिर के बाद कालेश्वरएकमात्रऐसा मंदिर है जिसके गर्भ गृह में ज्योर्तिलिंगस्थापितहै। यहां भगवान शिव एक अद्भुत लिंगरूपमेंविराजमान हैं।
कालेश्वरमेंस्थित कालीनाथमंदिरका इतिहास पांडवों जुडाहै। जनश्रुतिकेअनुसार इस स्थल पर पांडव अज्ञातवास के दौरान आए थे और इसका प्रमाण ब्यासनदीके तट पर उनके द्वारा बनाई गई पौडियोंसेमिलता है। बताया जाता है कि पांडव जब यहां आए तो भारत के पांच प्रसिद्ध तीथरेंहरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन,नासिकव रामेश्वरमकाजल अपने साथ लाए थे और जल को यहां स्थित तालाब में डाल दिया था जिसे पंचतीर्थीकेनाम से जाना जाता है। तबसे पंचतीर्थीतथा व्यास नदी में स्नान को हरिद्वार में स्नान के तुल्य माना गया है।
किवदंतीकेअनुसार महर्षि व्यास ने यहां घोर तपस्या की थी। इसका प्रमाण इस स्थल पर स्थित ऋषि-मुनियों की समाधियां से मिलता है। मंदिर का निर्माण पांडवों, कुटलैहडएवंजम्मू की महारानी व राजा गुलेरनेकरवाया था। इस तीर्थ स्थल के साथ महाकाली के विचरण का महात्म्यभीजुडाहै।
कालेश्वरमेंस्थित कालीनाथमंदिरका इतिहास पांडवों जुडाहै। जनश्रुतिकेअनुसार इस स्थल पर पांडव अज्ञातवास के दौरान आए थे और इसका प्रमाण ब्यासनदीके तट पर उनके द्वारा बनाई गई पौडियोंसेमिलता है। बताया जाता है कि पांडव जब यहां आए तो भारत के पांच प्रसिद्ध तीथरेंहरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन,नासिकव रामेश्वरमकाजल अपने साथ लाए थे और जल को यहां स्थित तालाब में डाल दिया था जिसे पंचतीर्थीकेनाम से जाना जाता है। तबसे पंचतीर्थीतथा व्यास नदी में स्नान को हरिद्वार में स्नान के तुल्य माना गया है।
किवदंतीकेअनुसार महर्षि व्यास ने यहां घोर तपस्या की थी। इसका प्रमाण इस स्थल पर स्थित ऋषि-मुनियों की समाधियां से मिलता है। मंदिर का निर्माण पांडवों, कुटलैहडएवंजम्मू की महारानी व राजा गुलेरनेकरवाया था। इस तीर्थ स्थल के साथ महाकाली के विचरण का महात्म्यभीजुडाहै।
Wednesday, April 20, 2011
शंकर-सुवन केसरी नंदन
हनुमदुपासना कल्पद्रुमनामक प्राचीन ग्रंथ में लिखा है- चैत्र मासिसितेपक्षेपौर्णमास्यांकुजेऽहनि।मौलीमेखलयायुक्तकौपीन परिधारक।अर्थात चैत्र मास के शुक्लपक्ष में मंगलवार और पूर्णिमा के संयोग की बेला में मूंज की मेखला से युक्त लंगोटी पहने तथा यज्ञोपवीत धारण किए हुए हनुमानजी का आविर्भाव हुआ।
स्कंदपुराणके वैष्णवखंडके 40वेंअध्याय के 43वेंश्लोक में स्पष्ट कहा गया है कि मेष राशि में सूर्य के उच्च स्थिति में होने पर चित्रा नक्षत्र से संयुक्त चैत्रीपूर्णिमा के दिन हनुमानजी का अवतरण हुआ। वहीं आनंद रामायण में भी चैत्रीपूर्णिमा को ही हनुमानजी की जयंती-तिथि माना गया है।
हालांकि अयोध्या की हनुमानगढीतथा देश के कुछ हिस्सों में कार्तिक मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी तिथि को भी हनुमान जयंती मनाई जाती है। इसके पीछे वायुपुराण का वह संदर्भ है, जिसमें कहा गया है कि अमावस्या के दिन समाप्त होने वाले आश्रि्वन मास की चतुर्दशी तिथि, मंगलवार और स्वाति नक्षत्र के संयोग में मेष लग्न के समय भगवान शंकर हनुमानजी के रूप में उत्पन्न हुए। लेकिन ज्यादातर स्थानों में चैत्रीपूर्णिमा के दिन ही हनुमान-जयंती का उत्सव मनाया जाता है।
ग्रंथों में हनुमानजी के रुद्रावतारअर्थात् भगवान शंकर का अंश होने से संबंधित अनेक कथाएं मिलती है। एक कथा के अनुसार, शिवजी ने श्रीरामचंद्र जी की स्तुति की और यह वर मांगा कि प्रभो!मैं दास्यभावसे आपकी सेवा करना चाहता हूं. श्रीरामचंद्रजीने शिवजी के प्रेम से वशीभूत होकर तथास्तु कहा। कालांतर में शिवजी हनुमान के रूप में अवतरित होकर श्रीरामचंद्र जी के प्रमुख सेवक बनें।
विनयपत्रिकाके पदों में गोस्वामी तुलसीदास ने हनुमानजी को रुद्रावतार,महादेव, वामदेव,कालाग्नि,वानराकारविग्रहपुरारी,मंमथ-मथनआदि शिव-सूचक नामों से संबोधित किया है।
दोहावलीमें तुलसी इस विषय में कहते है- जेहिसरीररति राम सोंसोइआदरहिंसुजान/ रुद्रदेहतजिनेहबसवानर भेहनुमान/ जानिराम-सेवा सरस समुझिकरबअनुमान/पुरुषा तेसेवक भएहर तेभेहनुमान।
हनुमान चालीसा में भी तुलसीदास ने हनुमानजी को संकर सुवनकहकर रुद्रावतारघोषित किया।
एक तरफ भगवान शंकर रामचंद्र जी को अपना आराध्य मानते हैं, वहीं दूसरी ओर श्रीराम रामेश्वर के रूप में उनका पूजन करते है। शिवजी पर चढने वाले बिल्व पत्रों पर राम-नाम लिखने का तात्पर्य भी हरि-हर की एकरूपता है। तत्वतये दोनों एक ही है। बस नाम, स्वरूप और गुण का भेद है। हनुमानजी का शंकर-सुवन होकर रामदूत बनना इसका प्रमाण है।
स्कंदपुराणके वैष्णवखंडके 40वेंअध्याय के 43वेंश्लोक में स्पष्ट कहा गया है कि मेष राशि में सूर्य के उच्च स्थिति में होने पर चित्रा नक्षत्र से संयुक्त चैत्रीपूर्णिमा के दिन हनुमानजी का अवतरण हुआ। वहीं आनंद रामायण में भी चैत्रीपूर्णिमा को ही हनुमानजी की जयंती-तिथि माना गया है।
हालांकि अयोध्या की हनुमानगढीतथा देश के कुछ हिस्सों में कार्तिक मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी तिथि को भी हनुमान जयंती मनाई जाती है। इसके पीछे वायुपुराण का वह संदर्भ है, जिसमें कहा गया है कि अमावस्या के दिन समाप्त होने वाले आश्रि्वन मास की चतुर्दशी तिथि, मंगलवार और स्वाति नक्षत्र के संयोग में मेष लग्न के समय भगवान शंकर हनुमानजी के रूप में उत्पन्न हुए। लेकिन ज्यादातर स्थानों में चैत्रीपूर्णिमा के दिन ही हनुमान-जयंती का उत्सव मनाया जाता है।
ग्रंथों में हनुमानजी के रुद्रावतारअर्थात् भगवान शंकर का अंश होने से संबंधित अनेक कथाएं मिलती है। एक कथा के अनुसार, शिवजी ने श्रीरामचंद्र जी की स्तुति की और यह वर मांगा कि प्रभो!मैं दास्यभावसे आपकी सेवा करना चाहता हूं. श्रीरामचंद्रजीने शिवजी के प्रेम से वशीभूत होकर तथास्तु कहा। कालांतर में शिवजी हनुमान के रूप में अवतरित होकर श्रीरामचंद्र जी के प्रमुख सेवक बनें।
विनयपत्रिकाके पदों में गोस्वामी तुलसीदास ने हनुमानजी को रुद्रावतार,महादेव, वामदेव,कालाग्नि,वानराकारविग्रहपुरारी,मंमथ-मथनआदि शिव-सूचक नामों से संबोधित किया है।
दोहावलीमें तुलसी इस विषय में कहते है- जेहिसरीररति राम सोंसोइआदरहिंसुजान/ रुद्रदेहतजिनेहबसवानर भेहनुमान/ जानिराम-सेवा सरस समुझिकरबअनुमान/पुरुषा तेसेवक भएहर तेभेहनुमान।
हनुमान चालीसा में भी तुलसीदास ने हनुमानजी को संकर सुवनकहकर रुद्रावतारघोषित किया।
एक तरफ भगवान शंकर रामचंद्र जी को अपना आराध्य मानते हैं, वहीं दूसरी ओर श्रीराम रामेश्वर के रूप में उनका पूजन करते है। शिवजी पर चढने वाले बिल्व पत्रों पर राम-नाम लिखने का तात्पर्य भी हरि-हर की एकरूपता है। तत्वतये दोनों एक ही है। बस नाम, स्वरूप और गुण का भेद है। हनुमानजी का शंकर-सुवन होकर रामदूत बनना इसका प्रमाण है।
Friday, April 8, 2011
राम ने की थी शक्ति पूजा
चित्रकूट में स्फटिक शिला वर्षो से लोगों की आस्था का केंद्र बनी हुई है। मान्यता है कि इस पर बैठकर ही श्रीराम ने रावण से युद्ध करने से पहले शक्ति पूजा की थी.
एक बार चुनिकुसुम सुहाए,
मधुकर भूषण राम बनाये।
सीतहिंपहिरायेप्रभु सादर,
बैठे फटिक शिला पर सुंदर।
तुलसी दास जी ने ये पंक्तियां श्रीरामचरितमानस में लिखी थीं। ये पक्तियांवास्तव में चित्रकूट में परांबाजगदीश्वरीजगदाराध्याश्रीसीतारूपिणीमहामाया की भाव-भक्ति भरी उस पूजा की ओर इंगित करती हैं, जिसके बारे में मान्यता है कि अखिल बह्मंाडनायक श्रीराम जी ने स्फटिक शिला पर बैठकर की थी। युगों से चित्रकूट आने वाली लाखों श्रद्धालु मंदाकिनी के तीर पर विशालकाय अर्जुन के वृक्ष की छाया से आच्छादित इस विशालकाय चित्रण पर अपना शीश नवातेहैं।
आदि कवि वाल्मीकि हों, तुलसी हों या फिर कविवरनिराला, सभी ने चित्रकूट में राम की शक्ति पूजा को व्याख्यायितकिया है। ग्रंथों में उल्लेख है कि श्रीराम ने अपने जीवन काल में दो विशेष आराधनाएंकी थीं, जिनके विशेष आराधना स्थल चित्रकूट और रामेश्वरमरहे।
तपस्थलीमाने जाने वाले चित्रकूट के प्रमुख संत स्वामी सनकादिककहते हैं, वास्तव में चित्रकूट सुखविलासहै। यहां श्रीराम अपने पूर्णतमपरमात्मा के स्वरूप में विद्यमान हैं। चित्रकूट में उन्होंने मां भगवती सीता के स्वरूप में मां भगवती की आराधना की है। महाकवि कालिदासव निराला जी के साथ ही देवी भागवत जैसे ग्रंथ भी इस बात की ताकीद करते हैं। वे कविवरनिराला रचित अनामिका को अपने सुमधुर कंठ से गाते हुए कहते हैं - मात दशभुजाविश्व ज्योति मैं हूं, आश्रित/ हो विद्ध शक्ति में है खल महिषासुर मर्दित / जन रंजन चरण कमल तल / धन्य सिंह गर्जित/यह मेरा प्रतीक मात समझा इंगित/ मै, सिंह इसी भाव से करूंगा अभिनंदन.।
सनकादिककहते है कि चित्रकूट वह तीर्थ है, जहां प्रभु श्रीराम ने दशानन के संहार के लिए साढे ग्यारह साल मां भगवती की तपस्या की थी।
एक बार चुनिकुसुम सुहाए,
मधुकर भूषण राम बनाये।
सीतहिंपहिरायेप्रभु सादर,
बैठे फटिक शिला पर सुंदर।
तुलसी दास जी ने ये पंक्तियां श्रीरामचरितमानस में लिखी थीं। ये पक्तियांवास्तव में चित्रकूट में परांबाजगदीश्वरीजगदाराध्याश्रीसीतारूपिणीमहामाया की भाव-भक्ति भरी उस पूजा की ओर इंगित करती हैं, जिसके बारे में मान्यता है कि अखिल बह्मंाडनायक श्रीराम जी ने स्फटिक शिला पर बैठकर की थी। युगों से चित्रकूट आने वाली लाखों श्रद्धालु मंदाकिनी के तीर पर विशालकाय अर्जुन के वृक्ष की छाया से आच्छादित इस विशालकाय चित्रण पर अपना शीश नवातेहैं।
आदि कवि वाल्मीकि हों, तुलसी हों या फिर कविवरनिराला, सभी ने चित्रकूट में राम की शक्ति पूजा को व्याख्यायितकिया है। ग्रंथों में उल्लेख है कि श्रीराम ने अपने जीवन काल में दो विशेष आराधनाएंकी थीं, जिनके विशेष आराधना स्थल चित्रकूट और रामेश्वरमरहे।
तपस्थलीमाने जाने वाले चित्रकूट के प्रमुख संत स्वामी सनकादिककहते हैं, वास्तव में चित्रकूट सुखविलासहै। यहां श्रीराम अपने पूर्णतमपरमात्मा के स्वरूप में विद्यमान हैं। चित्रकूट में उन्होंने मां भगवती सीता के स्वरूप में मां भगवती की आराधना की है। महाकवि कालिदासव निराला जी के साथ ही देवी भागवत जैसे ग्रंथ भी इस बात की ताकीद करते हैं। वे कविवरनिराला रचित अनामिका को अपने सुमधुर कंठ से गाते हुए कहते हैं - मात दशभुजाविश्व ज्योति मैं हूं, आश्रित/ हो विद्ध शक्ति में है खल महिषासुर मर्दित / जन रंजन चरण कमल तल / धन्य सिंह गर्जित/यह मेरा प्रतीक मात समझा इंगित/ मै, सिंह इसी भाव से करूंगा अभिनंदन.।
सनकादिककहते है कि चित्रकूट वह तीर्थ है, जहां प्रभु श्रीराम ने दशानन के संहार के लिए साढे ग्यारह साल मां भगवती की तपस्या की थी।
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