शिव शक्ति मंदिर में पण्डित भोलानाथ ने प्रवचनों में कहा कि मनुष्य जीवन इस सृष्टि की सबसे अनुपम कृति है। अत:मनुष्य को चाहिए कि वह अपने जीवन को सुधारने के लिए अच्छे कर्म करने के साथ-साथ रामनाम का जाप करे।
राम नाम का जाप करने से जहां मनुष्य का मन शुद्ध होता है। वहीं मनुष्य इससे परोपकारी भी हो जाता है। उन्होंने कहा कि मनुष्य को चाहिए कि वह अपनी इच्छाओं को त्याग कर दूसरों के भले ही सोचे और अपने मन को स्थिर करे। इस प्रकार सत्कर्म करने का फल उसे अवश्य मिलेगा और उसका जीवन व्यर्थ नहीं जाएगा।
उन्होंने कहा कि मनुष्य द्वारा श्रेष्ठ लक्ष्य की प्राप्ति में अनेक बाधाएं आना स्वाभाविक है, परन्तु मनुष्य अध्यात्म के बल पर सभी बाधाओं को आसानी से पार कर लेता हैं। अध्यात्म की शक्ति मनुष्य को प्रेरणा देती है कि वह कर्म फल की प्राप्ति के लिए आत्म समर्पण कर दे। साधना करने के परिणाम काफी सुखद होते हैं। हालांकि प्रारंभ में साधना करते हुए मनुष्य को कुछ परेशानियों का सामना करना पडता है परंतु आखिरकार इसके परिणाम काफी सुखद होते हैं। उन्होंने कहा कि धर्म जीवन का अभिन्न अंग है और धर्म के सेवन से ही प्रकृति में परिवर्तन आता है और मनुष्य के जीवन में आध्यात्मिक ऊर्ज का आविर्भाव होता है। ईश्वर की उपासना समर्पण भाव से की जानी चाहिए और मनुष्य को चाहिए कि वह अपने अंदर के रोग-द्वेष को अपने विवेक की कैंची से काट डाले तभी कल्याण का मार्ग प्रशस्त होगा। इसके लिए मानव को इंद्रियों पर काबू पाना सीखना चाहिए।
भगवान श्रीकृष्ण ने इंद्रियों का संचालन करना मानव को सिखाया है। इंद्रियों का संचालन ही हृदय का गोकुल है। उन्होंने कहा कि भोजन थाली में होगा तो पेट में भी होगा और अगर थाली ही खाली हो तो पेट भरने की आश छोड देनी चाहिए। कुछ लोग मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं रखते, लेकिन इस पूजा से ही अंदर की पूजा तक पहुंचा जा सकता है।
उन्होंने कहा कि अंदर की पूजा को जानने से पहले यानी भगवान को जानने के लिए अंदर की पूजा से पहले बाहर की पूजा बहुत जरूरी है। आंखें जो बाहर देखती हैं उसी का ध्यान अंदर करती हैं। इसी प्रकार से कान बाहर से सुनकर उसका अंदर चिंतन करते हैं इसलिए पूजा की जोत की ज्वाला शरीर के बाहर तक ही नहीं बल्कि अंदर तक भी जानी बहुत जरूरी है।
Monday, June 15, 2009
आरती क्यों और कैसे?
पूजा के अंत में हम सभी भगवान की आरती करते हैं। आरती के दौरान कई सामग्रियों का प्रयोग किया जाता है। इन सबका विशेष अर्थ होता है। ऐसी मान्यता है कि न केवल आरती करने, बल्कि इसमें शामिल होने पर भी बहुत पुण्य मिलता है। किसी भी देवता की आरती करते समय उन्हें 3बार पुष्प अर्पित करें। इस दरम्यान ढोल, नगाडे, घडियाल आदि भी बजाना चाहिए।
एक शुभ पात्र में शुद्ध घी लें और उसमें विषम संख्या [जैसे 3,5या 7]में बत्तियां जलाकर आरती करें। आप चाहें, तो कपूर से भी आरती कर सकते हैं। सामान्य तौर पर पांच बत्तियों से आरती की जाती है, जिसे पंच प्रदीप भी कहते हैं। आरती पांच प्रकार से की जाती है। पहली दीपमाला से, दूसरी जल से भरे शंख से, तीसरा धुले हुए वस्त्र से, चौथी आम और पीपल आदि के पत्तों से और पांचवीं साष्टांग अर्थात शरीर के पांचों भाग [मस्तिष्क, दोनों हाथ-पांव] से। पंच-प्राणों की प्रतीक आरती हमारे शरीर के पंच-प्राणों की प्रतीक है। आरती करते हुए भक्त का भाव ऐसा होना चाहिए, मानो वह पंच-प्राणों की सहायता से ईश्वर की आरती उतार रहा हो। घी की ज्योति जीव के आत्मा की ज्योति का प्रतीक मानी जाती है। यदि हम अंतर्मन से ईश्वर को पुकारते हैं, तो यह पंचारतीकहलाती है। सामग्री का महत्व आरती के दौरान हम न केवल कलश का प्रयोग करते हैं, बल्कि उसमें कई प्रकार की सामग्रियां भी डालते जाते हैं। इन सभी के पीछे न केवल धार्मिक, बल्कि वैज्ञानिक आधार भी हैं।
कलश-कलश एक खास आकार का बना होता है। इसके अंदर का स्थान बिल्कुल खाली होता है। कहते हैं कि इस खाली स्थान में शिव बसते हैं।
यदि आप आरती के समय कलश का प्रयोग करते हैं, तो इसका अर्थ है कि आप शिव से एकाकार हो रहे हैं। किंवदंतिहै कि समुद्र मंथन के समय विष्णु भगवान ने अमृत कलश धारण किया था। इसलिए कलश में सभी देवताओं का वास माना जाता है।
जल-जल से भरा कलश देवताओं का आसन माना जाता है। दरअसल, हम जल को शुद्ध तत्व मानते हैं, जिससे ईश्वर आकृष्ट होते हैं।
नारियल- आरती के समय हम कलश पर नारियल रखते हैं। नारियल की शिखाओं में सकारात्मक ऊर्जा का भंडार पाया जाता है। हम जब आरती गाते हैं, तो नारियल की शिखाओं में मौजूद ऊर्जा तरंगों के माध्यम से कलश के जल में पहुंचती है। यह तरंगें काफी सूक्ष्म होती हैं।
सोना- ऐसी मान्यता है कि सोना अपने आस-पास के वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा फैलाता है। सोने को शुद्ध कहा जाता है।
यही वजह है कि इसे भक्तों को भगवान से जोडने का माध्यम भी माना जाता है।
तांबे का पैसा- तांबे में सात्विक लहरें उत्पन्न करने की क्षमता अधिक होती है। कलश में उठती हुई लहरें वातावरण में प्रवेश कर जाती हैं। कलश में पैसा डालना त्याग का प्रतीक भी माना जाता है। यदि आप कलश में तांबे के पैसे डालते हैं, तो इसका मतलब है कि आपमें सात्विक गुणों का समावेश हो रहा है।
सप्तनदियोंका जल-गंगा, गोदावरी,यमुना, सिंधु, सरस्वती, कावेरीऔर नर्मदा नदी का जल पूजा के कलश में डाला जाता है। सप्त नदियों के जल में सकारात्मक ऊर्जा को आकृष्ट करने और उसे वातावरण में प्रवाहित करने की क्षमता होती है। क्योंकि ज्यादातर योगी-मुनि ने ईश्वर से एकाकार करने के लिए इन्हीं नदियों के किनारे तपस्या की थी। सुपारी और पान- यदि हम जल में सुपारी डालते हैं, तो इससे उत्पन्न तरंगें हमारे रजोगुण को समाप्त कर देते हैं और हमारे भीतर देवता के अच्छे गुणों को ग्रहण करने की क्षमता बढ जाती है। पान की बेल को नागबेलभी कहते हैं।
नागबेलको भूलोक और ब्रह्मलोक को जोडने वाली कडी माना जाता है। इसमें भूमि तरंगों को आकृष्ट करने की क्षमता होती है। साथ ही, इसे सात्विक भी कहा गया है। देवता की मूर्ति से उत्पन्न सकारात्मक ऊर्जा पान के डंठल द्वारा ग्रहण की जाती है।
तुलसी-आयुर्र्वेद में तुलसी का प्रयोग सदियों से होता आ रहा है। अन्य वनस्पतियों की तुलना में तुलसी में वातावरण को शुद्ध करने की क्षमता अधिक होती है।
एक शुभ पात्र में शुद्ध घी लें और उसमें विषम संख्या [जैसे 3,5या 7]में बत्तियां जलाकर आरती करें। आप चाहें, तो कपूर से भी आरती कर सकते हैं। सामान्य तौर पर पांच बत्तियों से आरती की जाती है, जिसे पंच प्रदीप भी कहते हैं। आरती पांच प्रकार से की जाती है। पहली दीपमाला से, दूसरी जल से भरे शंख से, तीसरा धुले हुए वस्त्र से, चौथी आम और पीपल आदि के पत्तों से और पांचवीं साष्टांग अर्थात शरीर के पांचों भाग [मस्तिष्क, दोनों हाथ-पांव] से। पंच-प्राणों की प्रतीक आरती हमारे शरीर के पंच-प्राणों की प्रतीक है। आरती करते हुए भक्त का भाव ऐसा होना चाहिए, मानो वह पंच-प्राणों की सहायता से ईश्वर की आरती उतार रहा हो। घी की ज्योति जीव के आत्मा की ज्योति का प्रतीक मानी जाती है। यदि हम अंतर्मन से ईश्वर को पुकारते हैं, तो यह पंचारतीकहलाती है। सामग्री का महत्व आरती के दौरान हम न केवल कलश का प्रयोग करते हैं, बल्कि उसमें कई प्रकार की सामग्रियां भी डालते जाते हैं। इन सभी के पीछे न केवल धार्मिक, बल्कि वैज्ञानिक आधार भी हैं।
कलश-कलश एक खास आकार का बना होता है। इसके अंदर का स्थान बिल्कुल खाली होता है। कहते हैं कि इस खाली स्थान में शिव बसते हैं।
यदि आप आरती के समय कलश का प्रयोग करते हैं, तो इसका अर्थ है कि आप शिव से एकाकार हो रहे हैं। किंवदंतिहै कि समुद्र मंथन के समय विष्णु भगवान ने अमृत कलश धारण किया था। इसलिए कलश में सभी देवताओं का वास माना जाता है।
जल-जल से भरा कलश देवताओं का आसन माना जाता है। दरअसल, हम जल को शुद्ध तत्व मानते हैं, जिससे ईश्वर आकृष्ट होते हैं।
नारियल- आरती के समय हम कलश पर नारियल रखते हैं। नारियल की शिखाओं में सकारात्मक ऊर्जा का भंडार पाया जाता है। हम जब आरती गाते हैं, तो नारियल की शिखाओं में मौजूद ऊर्जा तरंगों के माध्यम से कलश के जल में पहुंचती है। यह तरंगें काफी सूक्ष्म होती हैं।
सोना- ऐसी मान्यता है कि सोना अपने आस-पास के वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा फैलाता है। सोने को शुद्ध कहा जाता है।
यही वजह है कि इसे भक्तों को भगवान से जोडने का माध्यम भी माना जाता है।
तांबे का पैसा- तांबे में सात्विक लहरें उत्पन्न करने की क्षमता अधिक होती है। कलश में उठती हुई लहरें वातावरण में प्रवेश कर जाती हैं। कलश में पैसा डालना त्याग का प्रतीक भी माना जाता है। यदि आप कलश में तांबे के पैसे डालते हैं, तो इसका मतलब है कि आपमें सात्विक गुणों का समावेश हो रहा है।
सप्तनदियोंका जल-गंगा, गोदावरी,यमुना, सिंधु, सरस्वती, कावेरीऔर नर्मदा नदी का जल पूजा के कलश में डाला जाता है। सप्त नदियों के जल में सकारात्मक ऊर्जा को आकृष्ट करने और उसे वातावरण में प्रवाहित करने की क्षमता होती है। क्योंकि ज्यादातर योगी-मुनि ने ईश्वर से एकाकार करने के लिए इन्हीं नदियों के किनारे तपस्या की थी। सुपारी और पान- यदि हम जल में सुपारी डालते हैं, तो इससे उत्पन्न तरंगें हमारे रजोगुण को समाप्त कर देते हैं और हमारे भीतर देवता के अच्छे गुणों को ग्रहण करने की क्षमता बढ जाती है। पान की बेल को नागबेलभी कहते हैं।
नागबेलको भूलोक और ब्रह्मलोक को जोडने वाली कडी माना जाता है। इसमें भूमि तरंगों को आकृष्ट करने की क्षमता होती है। साथ ही, इसे सात्विक भी कहा गया है। देवता की मूर्ति से उत्पन्न सकारात्मक ऊर्जा पान के डंठल द्वारा ग्रहण की जाती है।
तुलसी-आयुर्र्वेद में तुलसी का प्रयोग सदियों से होता आ रहा है। अन्य वनस्पतियों की तुलना में तुलसी में वातावरण को शुद्ध करने की क्षमता अधिक होती है।
Friday, June 5, 2009
विवाह
प्राचीन काल से ही स्त्री और पुरुष दोनों के लिये यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार है। यज्ञोपवीत से समावर्तन संस्कार तक ब्रह्मचर्य व्रत के पालन का हमारे शास्त्रों में विधान है। वेदाध्ययन के बाद जब युवक में सामाजिक परम्परा निर्वाह करने की क्षमता व परिपक्वता आ जाती थी तो उसे गृर्हस्थ्य धर्म में प्रवेश कराया जाता था। लगभग पच्चीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य का व्रत का पालन करने के बाद युवक परिणय सूत्र में बंधता था।
हमारे शास्त्रों में आठ प्रकार के विवाहों का उल्लेख है- ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्रजापत्य, आसुर, गन्धर्व, राक्षस एवं पैशाच। वैदिक काल में ये सभी प्रथाएं प्रचलित थीं। समय के अनुसार इनका स्वरूप बदलता गया। वैदिक काल से पूर्व जब हमारा समाज संगठित नहीं था तो उस समय उच्छृंखल यौनाचार था। हमारे मनीषियों ने इस उच्छृंखलता को समाप्त करने के लिये विवाह संस्कार की स्थापना करके समाज को संगठित एवं नियमबद्ध करने का प्रयास किया। आज उन्हीं के प्रयासों का परिणाम है कि हमारा समाज सभ्य और सुसंस्कृत है।
हमारे शास्त्रों में आठ प्रकार के विवाहों का उल्लेख है- ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्रजापत्य, आसुर, गन्धर्व, राक्षस एवं पैशाच। वैदिक काल में ये सभी प्रथाएं प्रचलित थीं। समय के अनुसार इनका स्वरूप बदलता गया। वैदिक काल से पूर्व जब हमारा समाज संगठित नहीं था तो उस समय उच्छृंखल यौनाचार था। हमारे मनीषियों ने इस उच्छृंखलता को समाप्त करने के लिये विवाह संस्कार की स्थापना करके समाज को संगठित एवं नियमबद्ध करने का प्रयास किया। आज उन्हीं के प्रयासों का परिणाम है कि हमारा समाज सभ्य और सुसंस्कृत है।
Saturday, May 23, 2009
कर्णवेध
हमारे मनीषियों ने सभी संस्कारों को वैज्ञानिक कसौटी पर कसने के बाद ही प्रारम्भ किया है। कर्णवेध संस्कार का आधार बिल्कुल वैज्ञानिक है। बालक की शारीरिक व्याधि से रक्षा ही इस संस्कार का मूल उद्देश्य है। प्रकृति प्रदत्त इस शरीर के सारे अंग महत्वपूर्ण हैं। कान हमारे श्रवण द्वार हैं। कर्ण वेधन से व्याधियां दूर होती हैं तथा श्रवण शक्ति भी बढ़ती है। इसके साथ ही कानों में आभूषण हमारे सौन्दर्य बोध का परिचायक भी है।
यज्ञोपवीत के पूर्व इस संस्कार को करने का विधान है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शुक्ल पक्ष के शुभ मुहूर्त में इस संस्कार का सम्पादन श्रेयस्कर है।
यज्ञोपवीत के पूर्व इस संस्कार को करने का विधान है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शुक्ल पक्ष के शुभ मुहूर्त में इस संस्कार का सम्पादन श्रेयस्कर है।
Friday, May 1, 2009
अक्षय पुण्यों का त्योहार है अक्षय तृतीया
किसी भी शुभ कर्म के लिए काफी पवित्र माने जाने वाले अक्षय तृतीया पर्व पर हिन्दू श्रद्धालु नए निवेश या दान आदि कर्म को फलदायक मानते हैं। मान्यता है कि इसी दिन त्रेतायुग की शुरुआत हुई थी और महर्षि वेद व्यास ने भी इसी दिन महाभारत लिखनी शुरू की थी। इस बार सोमवार को अक्षय तृतीया का त्योहार है और लोगों में इसको लेकर अभी से ही काफी उत्सुकता है।
धर्म विशेषज्ञों के अनुसार मान्यता है कि अक्षय तृतीया के दिन किए जाने वाले कामों और दान का फल अक्षय रहता है अर्थात कभी नहीं मिटता। इसी कारण लोग इस दिन विभिन्न वस्तुओं का दान करते हैं। हिन्दू त्योहारों और वृक्षों के बारे में कई पुस्तकें लिख चुके लखनऊ के राधाकृष्ण दुबे के अनुसार अक्षय तृतीया पर्व वैशाख मास में शुक्ल पक्ष के तीसरे दिन पडता है।
दुबे ने कहा कि यह भी मान्यता है कि अक्षय तृतीया के दिन विष्णु भगवान के अवतार परशुराम का जन्म हुआ था। उन्होंने कहा कि पूरा वैशाख माह ही भगवान विष्णु से संबंधित माना जाता है। भगवान विष्णु को परोपकार बहुत प्रिय है, इसलिए श्रद्धालु पूरे वैशाख मास विशेषतौर पर अक्षय तृतीया के दिन दान करते हैं, जो परोपकार ही है।
उन्होंने कहा कि आजकल अक्षय तृतीया पर सोना, चांदी और आभूषण खरीदने का चलन शुरू हो गया है। इस चलन का कोई शास्त्रीय आधार नहीं है। यह चलन त्योहारों के व्यवसायीकरण के अलावा और कुछ नहीं है।
दिल्ली के राजकीय विद्यालय में संस्कृत के अध्यापक और कर्मकांडी पंडित बालकृष्ण चतुर्वेदी के अनुसार अक्षय तृतीया पर्व चूंकि गर्मी के मौसम में पडता है इसलिए इस पर्व पर ऐसी चीजों के दान का महत्व अधिक है जो गर्मियों के अनुकूल हो। उन्होंने बताया कि इस पर्व पर लोग प्राय: मिट्टी के बने घडे, सुराही, मीठा शरबत, सत्तू,खरबूजा और हाथ के पंखे आदि दान करते हैं। उन्होंने कहा कि कुछ लोग इस दिन आंवले के वृक्ष के नीचे भोजन करना पवित्र मानते हैं।
चतुर्वेदी ने कहा कि इस दिन दान करने से हजार गुना फल मिलने की मान्यता है। संभवत:इसी मान्यता के चलते अक्षय तृतीया के दिन विवाह कराना पवित्र माना गया है। हिन्दू धर्म में विवाह को भी कन्या दान की संज्ञा दी जाती है। यही वजह है कि राजस्थान में बहुत से लोग इसी दिन विवाह करना पसंद करते हैं।
धर्म विशेषज्ञों के अनुसार मान्यता है कि अक्षय तृतीया के दिन किए जाने वाले कामों और दान का फल अक्षय रहता है अर्थात कभी नहीं मिटता। इसी कारण लोग इस दिन विभिन्न वस्तुओं का दान करते हैं। हिन्दू त्योहारों और वृक्षों के बारे में कई पुस्तकें लिख चुके लखनऊ के राधाकृष्ण दुबे के अनुसार अक्षय तृतीया पर्व वैशाख मास में शुक्ल पक्ष के तीसरे दिन पडता है।
दुबे ने कहा कि यह भी मान्यता है कि अक्षय तृतीया के दिन विष्णु भगवान के अवतार परशुराम का जन्म हुआ था। उन्होंने कहा कि पूरा वैशाख माह ही भगवान विष्णु से संबंधित माना जाता है। भगवान विष्णु को परोपकार बहुत प्रिय है, इसलिए श्रद्धालु पूरे वैशाख मास विशेषतौर पर अक्षय तृतीया के दिन दान करते हैं, जो परोपकार ही है।
उन्होंने कहा कि आजकल अक्षय तृतीया पर सोना, चांदी और आभूषण खरीदने का चलन शुरू हो गया है। इस चलन का कोई शास्त्रीय आधार नहीं है। यह चलन त्योहारों के व्यवसायीकरण के अलावा और कुछ नहीं है।
दिल्ली के राजकीय विद्यालय में संस्कृत के अध्यापक और कर्मकांडी पंडित बालकृष्ण चतुर्वेदी के अनुसार अक्षय तृतीया पर्व चूंकि गर्मी के मौसम में पडता है इसलिए इस पर्व पर ऐसी चीजों के दान का महत्व अधिक है जो गर्मियों के अनुकूल हो। उन्होंने बताया कि इस पर्व पर लोग प्राय: मिट्टी के बने घडे, सुराही, मीठा शरबत, सत्तू,खरबूजा और हाथ के पंखे आदि दान करते हैं। उन्होंने कहा कि कुछ लोग इस दिन आंवले के वृक्ष के नीचे भोजन करना पवित्र मानते हैं।
चतुर्वेदी ने कहा कि इस दिन दान करने से हजार गुना फल मिलने की मान्यता है। संभवत:इसी मान्यता के चलते अक्षय तृतीया के दिन विवाह कराना पवित्र माना गया है। हिन्दू धर्म में विवाह को भी कन्या दान की संज्ञा दी जाती है। यही वजह है कि राजस्थान में बहुत से लोग इसी दिन विवाह करना पसंद करते हैं।
गुण की गायत्री
गायत्री मंत्र न केवल वेदों का जन्मदाता है, बल्कि यह भारतीय सभ्यता और संस्कृति का सबसे पुराना मंत्र भी है। इसके माध्यम से हम ईश्वर से न केवल बुद्धि और विवेक, बल्कि सही राह दिखाने की प्रार्थना भी करते हैं। इस मंत्र के जाप से हम प्रकाश और जीवन देने वाले देवता सूर्य [सवितुर] की आराधना भी करते हैं।
मान्यता है कि गायत्री पांच सिरों वाली एक देवी हैं। जो लोग इस मंत्र का जाप करते हैं, यह देवी उन लोगों की पांचों इंद्रियों की रक्षा करती हैं। दरअसल, रक्षक होने के कारण ही गायत्री को सावित्री भी कहा जाता है। दुखों से मुक्ति गायत्री दो शब्दों गा और त्रायते के योग से बना है। गा का अर्थ है गाना अथवा प्रार्थना करना और त्रायतेका अर्थ है-दुखों, कष्टों और समस्याओं से मुक्ति। वास्तव में, जो व्यक्ति गायत्री मंत्र के अर्थ को भलीभांति जान लेता है और उसे अपने जीवन में उतार लेता है, वह निश्चय ही कठिन से कठिन बाधाओं को भी पार कर लेता है।
इसे गुरुमंत्र भी इसलिए कहते हैं, क्योंकि प्राचीनकाल में शिक्षा प्रदान करने से पहले गुरु ईश्वर की उपासना किया करते थे और इसके लिए वे गायत्री मंत्र का ही पाठ करते थे। ऋग्वेद और यजुर्वेद में गायत्री मंत्र की कई बार किसी न किसी रूप में चर्चा भी की गई है। आत्मबल का संचार ऋषियों-महात्माओं के अनुसार, गायत्री मंत्र के उच्चारण से हमारे मन पर एक सकारात्मक प्रभाव पडता है। यह मंत्र विपत्ति के समय न केवल हमें धैर्य और विवेक से काम लेने की सलाह देता है, बल्कि यह व्यक्ति में आत्मबल का संचार भी करता है। हम सभी अपने-अपने ढंग से ईश्वर की प्रार्थना करते हैं।
सच तो यह है कि ज्यादातर लोग चाहते हैं कि वे प्रभु का स्मरण ऐसी प्रार्थना के माध्यम से करें, जो सरल हो और उसे किसी भी स्थान पर प्रयोग में लाया जा सके। साधना और ध्यान के लिए जाप और अनुष्ठान का बहुत महत्व है। यदि हम किसी मंत्र का उच्चारण मन ही मन में कई बार करते हैं, तो वह जाप कहलाता है। इस क्रिया का हमारे मन और मस्तिष्क पर बहुत अधिक प्रभाव पडता है। साधक को जब भी समय मिलता है, वह जाप करना शुरू कर देता है। और ऐसा करने के कारण साधक का मन कभी खाली नहीं रह पाता। ऐसी स्थिति में मन में कभी बुरे विचार भी नहीं आ पाते हैं। मंत्र का अर्थ किसी भी व्यक्ति का आचार-व्यवहार उसके विचारों का ही प्रतिबिंब होता है। जाप से न केवल हमें बुराई से बचने में सहयोग मिलता है, बल्कि हम परोपकार भी करने लगते हैं। और यह तभी संभव हो पाता है, जब अर्थ समझकर ही जाप किया जाए। ओम ईश्वर अर्थात ब्रह्मा का मुख्य नाम है।
सृष्टि के प्रत्येक प्राणी में जीवन ईश्वर ने दिया है। भूर का अर्थ ब्रह्मांड का स्त्रोत, यानी ईश्वर को ही कहा गया है। भुव: का अर्थ पृथ्वी और स्वाहा स्वर्ग को कहा जाता है। सवितुर, यानी सविता- सूर्य की रोशनी को कहा जाता है। वरेण्यम का अर्थ है सर्वशक्तिमान और भर्गो कहते हैं कांति या तेज को। इस पंक्ति में सूर्य [भास्कर-उगते हुए सूर्य और प्रभात-डूबते हुए सूर्य] की कांति के बारे में बताया जा रहा है।
देवस्य का मतलब है देवता। धीमहि का अर्थ हुआ-हम चिंतन करते हैं। धियो, ज्ञान और बुद्धि को कहते हैं और यो मतलब कौन होता है। नहा का अर्थ हम लोग और प्रचोदयात का अर्थ है-जागृत करना। माना जाता है कि ईश्वर अपनी शक्ति के माध्यम से न केवल जीवों के कष्ट को दूर करते हैं, बल्कि पूरे ब्रह्मांड को संचालित करते हैं। इसलिए भूर, भुव:और स्व: शब्दों के माध्यम से हम परमेश्वर की स्तुति करते हैं। वरेण्यम अर्थात् हम ईश्वर की महानता को स्वीकार करते हैं। भर्गो देवस्यधीमहिका उच्चारण कर हम सर्वशक्तिमान ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि वे हमारी अज्ञानता और दोषों को दूर करें।
धियो यो न प्रचोदयात्से हम परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं कि वे हमारी बुद्धि और मन को श्रेष्ठ और उत्तम से उत्तम कर्मो में लगाएं। घृणा और ईष्र्या का त्याग ऋषियों और महात्माओं के अनुसार, यदि हमारे मन में दूसरों के प्रति घृणा या ईष्र्या का भाव रहेगा, तो कभी भी हम पर मंत्र जाप का सकारात्मक प्रभाव नहीं पडेगा। इसलिए हमें अपने मन से शत्रुता, ईष्र्या आदि का भाव निकाल देना चाहिए।
सच तो यह है कि यदि हम सच्चे और शुद्ध मन से गायत्री मंत्र का जाप करते हैं, तो न केवल सुख, बल्कि दुख में भी प्रसन्नचित्त रहेंगे। यह सच है कि जीवन में कई प्रकार की विपदाएं आती हैं, लेकिन यदि ऐसी स्थिति में हम धैर्य खो देंगे, तो कभी भी हमारे विचार दृढ नहीं हो पाएंगे। इसलिए जहां तक संभव हो सके, हमें किसी भी परिस्थिति में दूसरे व्यक्ति को मानसिक पीडा नहीं देनी चाहिए। इसलिए जहां तक संभव हो सके, हम दूसरों के दुखों को दूर करने का प्रयास करें।
और यदि हम ऐसा कर पाते हैं, तो वास्तव में यही गायत्री मंत्र का सौंदर्य है। गायत्री मंत्र वह प्रार्थना है, जिससे हमारे विचारों को सही तरह से और सही दिशा की ओर मार्गदर्शन मिलता है। यह मंत्र किसी शारीरिक पीडा को ठीक जरूर नहीं कर पाता है, बल्कि हमारी बुद्धि को अच्छे मार्ग की ओर तो ले ही जाता है।
स्वामी विवेकानंद के अनुसार, गायत्री मंत्र ध्यान का एक महत्वपूर्ण साधन है। लोकमान्य तिलक के शब्दों में यदि हम कुमार्ग त्याग कर सन्मार्ग का अनुसरण करना चाहते हैं, तो हमें प्रति दिन गायत्री मंत्र का जाप करना ही चाहिए। दरअसल, यह मंत्र हमारे लिए एक धरोहर के समान है, जिसका दैनिक जीवन में काफी महत्व है।
मान्यता है कि गायत्री पांच सिरों वाली एक देवी हैं। जो लोग इस मंत्र का जाप करते हैं, यह देवी उन लोगों की पांचों इंद्रियों की रक्षा करती हैं। दरअसल, रक्षक होने के कारण ही गायत्री को सावित्री भी कहा जाता है। दुखों से मुक्ति गायत्री दो शब्दों गा और त्रायते के योग से बना है। गा का अर्थ है गाना अथवा प्रार्थना करना और त्रायतेका अर्थ है-दुखों, कष्टों और समस्याओं से मुक्ति। वास्तव में, जो व्यक्ति गायत्री मंत्र के अर्थ को भलीभांति जान लेता है और उसे अपने जीवन में उतार लेता है, वह निश्चय ही कठिन से कठिन बाधाओं को भी पार कर लेता है।
इसे गुरुमंत्र भी इसलिए कहते हैं, क्योंकि प्राचीनकाल में शिक्षा प्रदान करने से पहले गुरु ईश्वर की उपासना किया करते थे और इसके लिए वे गायत्री मंत्र का ही पाठ करते थे। ऋग्वेद और यजुर्वेद में गायत्री मंत्र की कई बार किसी न किसी रूप में चर्चा भी की गई है। आत्मबल का संचार ऋषियों-महात्माओं के अनुसार, गायत्री मंत्र के उच्चारण से हमारे मन पर एक सकारात्मक प्रभाव पडता है। यह मंत्र विपत्ति के समय न केवल हमें धैर्य और विवेक से काम लेने की सलाह देता है, बल्कि यह व्यक्ति में आत्मबल का संचार भी करता है। हम सभी अपने-अपने ढंग से ईश्वर की प्रार्थना करते हैं।
सच तो यह है कि ज्यादातर लोग चाहते हैं कि वे प्रभु का स्मरण ऐसी प्रार्थना के माध्यम से करें, जो सरल हो और उसे किसी भी स्थान पर प्रयोग में लाया जा सके। साधना और ध्यान के लिए जाप और अनुष्ठान का बहुत महत्व है। यदि हम किसी मंत्र का उच्चारण मन ही मन में कई बार करते हैं, तो वह जाप कहलाता है। इस क्रिया का हमारे मन और मस्तिष्क पर बहुत अधिक प्रभाव पडता है। साधक को जब भी समय मिलता है, वह जाप करना शुरू कर देता है। और ऐसा करने के कारण साधक का मन कभी खाली नहीं रह पाता। ऐसी स्थिति में मन में कभी बुरे विचार भी नहीं आ पाते हैं। मंत्र का अर्थ किसी भी व्यक्ति का आचार-व्यवहार उसके विचारों का ही प्रतिबिंब होता है। जाप से न केवल हमें बुराई से बचने में सहयोग मिलता है, बल्कि हम परोपकार भी करने लगते हैं। और यह तभी संभव हो पाता है, जब अर्थ समझकर ही जाप किया जाए। ओम ईश्वर अर्थात ब्रह्मा का मुख्य नाम है।
सृष्टि के प्रत्येक प्राणी में जीवन ईश्वर ने दिया है। भूर का अर्थ ब्रह्मांड का स्त्रोत, यानी ईश्वर को ही कहा गया है। भुव: का अर्थ पृथ्वी और स्वाहा स्वर्ग को कहा जाता है। सवितुर, यानी सविता- सूर्य की रोशनी को कहा जाता है। वरेण्यम का अर्थ है सर्वशक्तिमान और भर्गो कहते हैं कांति या तेज को। इस पंक्ति में सूर्य [भास्कर-उगते हुए सूर्य और प्रभात-डूबते हुए सूर्य] की कांति के बारे में बताया जा रहा है।
देवस्य का मतलब है देवता। धीमहि का अर्थ हुआ-हम चिंतन करते हैं। धियो, ज्ञान और बुद्धि को कहते हैं और यो मतलब कौन होता है। नहा का अर्थ हम लोग और प्रचोदयात का अर्थ है-जागृत करना। माना जाता है कि ईश्वर अपनी शक्ति के माध्यम से न केवल जीवों के कष्ट को दूर करते हैं, बल्कि पूरे ब्रह्मांड को संचालित करते हैं। इसलिए भूर, भुव:और स्व: शब्दों के माध्यम से हम परमेश्वर की स्तुति करते हैं। वरेण्यम अर्थात् हम ईश्वर की महानता को स्वीकार करते हैं। भर्गो देवस्यधीमहिका उच्चारण कर हम सर्वशक्तिमान ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि वे हमारी अज्ञानता और दोषों को दूर करें।
धियो यो न प्रचोदयात्से हम परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं कि वे हमारी बुद्धि और मन को श्रेष्ठ और उत्तम से उत्तम कर्मो में लगाएं। घृणा और ईष्र्या का त्याग ऋषियों और महात्माओं के अनुसार, यदि हमारे मन में दूसरों के प्रति घृणा या ईष्र्या का भाव रहेगा, तो कभी भी हम पर मंत्र जाप का सकारात्मक प्रभाव नहीं पडेगा। इसलिए हमें अपने मन से शत्रुता, ईष्र्या आदि का भाव निकाल देना चाहिए।
सच तो यह है कि यदि हम सच्चे और शुद्ध मन से गायत्री मंत्र का जाप करते हैं, तो न केवल सुख, बल्कि दुख में भी प्रसन्नचित्त रहेंगे। यह सच है कि जीवन में कई प्रकार की विपदाएं आती हैं, लेकिन यदि ऐसी स्थिति में हम धैर्य खो देंगे, तो कभी भी हमारे विचार दृढ नहीं हो पाएंगे। इसलिए जहां तक संभव हो सके, हमें किसी भी परिस्थिति में दूसरे व्यक्ति को मानसिक पीडा नहीं देनी चाहिए। इसलिए जहां तक संभव हो सके, हम दूसरों के दुखों को दूर करने का प्रयास करें।
और यदि हम ऐसा कर पाते हैं, तो वास्तव में यही गायत्री मंत्र का सौंदर्य है। गायत्री मंत्र वह प्रार्थना है, जिससे हमारे विचारों को सही तरह से और सही दिशा की ओर मार्गदर्शन मिलता है। यह मंत्र किसी शारीरिक पीडा को ठीक जरूर नहीं कर पाता है, बल्कि हमारी बुद्धि को अच्छे मार्ग की ओर तो ले ही जाता है।
स्वामी विवेकानंद के अनुसार, गायत्री मंत्र ध्यान का एक महत्वपूर्ण साधन है। लोकमान्य तिलक के शब्दों में यदि हम कुमार्ग त्याग कर सन्मार्ग का अनुसरण करना चाहते हैं, तो हमें प्रति दिन गायत्री मंत्र का जाप करना ही चाहिए। दरअसल, यह मंत्र हमारे लिए एक धरोहर के समान है, जिसका दैनिक जीवन में काफी महत्व है।
Saturday, April 11, 2009
सबसे संपन्न मंदिर तिरु पति
तिरुपतिमंदिर में जब फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन भगवान वेंकटेश्वरके दर्शन के लिए पहुंचे, तो उन्होंने बारह करोड रुपये का दान दिया। यही वजह है कि यह भारत का सबसे अमीर मंदिर कहलाता है।
कहते हैं कि भगवान वेंकटेश्वरके चरणों में भक्तगण हीरे की थैली भी भेंट करते हैं। यहां सभी धर्मो के लोग बडी संख्या में पहुंचते हैं। ऐसी मान्यता है कि यहां आप भगवान से जो कुछ मांगते हैं, वह मिल जाता है। सात पहाडों वाला मंदिर सात पहाडों से मिलकर बना है तिरुमाला पहाड और इस पर स्थित है तिरुपतिमंदिर। सातों पहाड को शेषाचलमया वेंकटाचलमभी कहते हैं। तिरुमाला पहाड की चट्टानें पूरे विश्व में दूसरी सबसे पुरानी चट्टानें हैं। तिरुपतिमंदिर में निवास करते हैं भगवान वेंकटेश्वर।
भगवान वेंकटेश्वरको विष्णु का अवतार भी माना जाता है। यह मंदिर समुद्र से 28सौ फीट की ऊंचाई पर स्थित है। तिरुपतिएक महत्वपूर्ण तीर्थस्थान है, जहां भक्त अपने भगवान की एक झलक पाने के लिए घंटों लाइन में खडे रहते हैं। यह मंदिर तिरुपतिबालाजीमंदिर भी कहलाता है। अद्भुत वास्तुकला यह मंदिर आंध्रप्रदेश के चित्तूरजिले में स्थित है। इसे तमिल राजा थोंडेईमानने बनाया था। बाद के समय में चोल और तेलुगू राजाओं ने इसे और विकसित किया। यही वजह है कि इस पर द्रविडियन[तमिल] कला की स्पष्ट छाप देखी जा सकती है।
वास्तव में, मंदिर की वास्तुकला अद्भुत है। विजयनगरके राजा कृष्णदेवराय ने इस मंदिर में सोना, हीरे-जवाहरात आदि का दान दिया था। उसी समय से भक्तगण इस मंदिर को खूब दान देते आ रहे हैं। इस मंदिर का गोपुरम आकर्षण का मुख्य केंद्र है। मंदिर के गर्भगृह के ऊपर स्थित है आनंद निलयम,जो पूरी तरह सोने के प्लेटों से बना है। मंदिर की बनावट मंदिर को तीन भागों में बांटा जा सकता है। बाहरी प्रांगण को ध्वजास्तंभकहते हैं। मंदिर स्थल पर विजयनगरके राजा कृष्णदेवराय और उनकी पत्नी की मूर्ति भी स्थापित है। इसके अलावा, अकबर के एक मंत्री टोडरमलकी मूर्ति भी लगी हुई है। मुख्य मंदिर में भगवान की मूर्ति रखी हुई है, जिसमें भगवान विष्णु और शिव दोनों का रूप समाया हुआ है। सेवा और उत्सव तिरुपतिमंदिर में प्रतिदिन भगवान वेंकटेश्वरकी पूजा होती है। दिन की शुरुआतसुबह तीन बजे सुप्रभातम, यानी भगवान को जगाने से होती है। सबसे अंत में एकांत सेवा, यानी भगवान को सुलाया जाता है। यह सेवा रात के एक बजे तक संपन्न होती है।
भगवान की प्रार्थना-स्तुति प्रतिदिन, साप्ताहिक और पक्षीय रूपों में आयोजित की जाती है, जिसे सेवा और उत्सव कहते हैं। देवता को दिया जाने वाला चढावा या दान हुंडी कहलाती है। हर वर्ष सितंबर महीने में यहां ब्रह्मोत्सवमनाया जाता है।
कहते हैं कि भगवान वेंकटेश्वरके चरणों में भक्तगण हीरे की थैली भी भेंट करते हैं। यहां सभी धर्मो के लोग बडी संख्या में पहुंचते हैं। ऐसी मान्यता है कि यहां आप भगवान से जो कुछ मांगते हैं, वह मिल जाता है। सात पहाडों वाला मंदिर सात पहाडों से मिलकर बना है तिरुमाला पहाड और इस पर स्थित है तिरुपतिमंदिर। सातों पहाड को शेषाचलमया वेंकटाचलमभी कहते हैं। तिरुमाला पहाड की चट्टानें पूरे विश्व में दूसरी सबसे पुरानी चट्टानें हैं। तिरुपतिमंदिर में निवास करते हैं भगवान वेंकटेश्वर।
भगवान वेंकटेश्वरको विष्णु का अवतार भी माना जाता है। यह मंदिर समुद्र से 28सौ फीट की ऊंचाई पर स्थित है। तिरुपतिएक महत्वपूर्ण तीर्थस्थान है, जहां भक्त अपने भगवान की एक झलक पाने के लिए घंटों लाइन में खडे रहते हैं। यह मंदिर तिरुपतिबालाजीमंदिर भी कहलाता है। अद्भुत वास्तुकला यह मंदिर आंध्रप्रदेश के चित्तूरजिले में स्थित है। इसे तमिल राजा थोंडेईमानने बनाया था। बाद के समय में चोल और तेलुगू राजाओं ने इसे और विकसित किया। यही वजह है कि इस पर द्रविडियन[तमिल] कला की स्पष्ट छाप देखी जा सकती है।
वास्तव में, मंदिर की वास्तुकला अद्भुत है। विजयनगरके राजा कृष्णदेवराय ने इस मंदिर में सोना, हीरे-जवाहरात आदि का दान दिया था। उसी समय से भक्तगण इस मंदिर को खूब दान देते आ रहे हैं। इस मंदिर का गोपुरम आकर्षण का मुख्य केंद्र है। मंदिर के गर्भगृह के ऊपर स्थित है आनंद निलयम,जो पूरी तरह सोने के प्लेटों से बना है। मंदिर की बनावट मंदिर को तीन भागों में बांटा जा सकता है। बाहरी प्रांगण को ध्वजास्तंभकहते हैं। मंदिर स्थल पर विजयनगरके राजा कृष्णदेवराय और उनकी पत्नी की मूर्ति भी स्थापित है। इसके अलावा, अकबर के एक मंत्री टोडरमलकी मूर्ति भी लगी हुई है। मुख्य मंदिर में भगवान की मूर्ति रखी हुई है, जिसमें भगवान विष्णु और शिव दोनों का रूप समाया हुआ है। सेवा और उत्सव तिरुपतिमंदिर में प्रतिदिन भगवान वेंकटेश्वरकी पूजा होती है। दिन की शुरुआतसुबह तीन बजे सुप्रभातम, यानी भगवान को जगाने से होती है। सबसे अंत में एकांत सेवा, यानी भगवान को सुलाया जाता है। यह सेवा रात के एक बजे तक संपन्न होती है।
भगवान की प्रार्थना-स्तुति प्रतिदिन, साप्ताहिक और पक्षीय रूपों में आयोजित की जाती है, जिसे सेवा और उत्सव कहते हैं। देवता को दिया जाने वाला चढावा या दान हुंडी कहलाती है। हर वर्ष सितंबर महीने में यहां ब्रह्मोत्सवमनाया जाता है।
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