Saturday, March 6, 2010

दून की आत्मा

मैं समय हूं। मैंने वह सबकुछ देखा व महसूस किया है, जो आज अतीत का हिस्सा है। मैंने उस कालखंड को भी देखा है कि जब सिखों के सातवें गुरु श्री गुरु हर राय ने अपने पुत्र बाबा रामराय को त्याग दिया था। खैर..यह सब होनी थी, जो अच्छे के लिए हो रही थी। मुझे याद है वह दिन जब वर्ष 1676 में श्री गुरु राम राय जी के कदम दून घाटी में पडे। मुगल बादशाह औरंगजेब श्री गुरु राम राय से बेहद प्रभावित था। जब उसे पता चला कि गुरु रामराय दूनघाटी में आ गए हैं, उसने गढवाल के तत्कालीन राजा फतेहशाह को उनकी हर संभव सहायता करने को कहा। फतेहशाह ने गुरु जी के दर्शन किए और उनसे यहीं रहने की प्रार्थना की। उसी समय राजा ने उन्हें तीन गांव खुडबुडा, राजपुर व चामासारी दान में दिए। बाद में राजा फतेहशाह के पोते प्रदीप शाह ने चार और गांव धामावाला, मियांवाला, पंडितवाडी व छरतावाला गुरु महाराज को दिए। श्री गुरु रामराय जी के डेरा स्थापित करने पर इसे डेरा दून कहा जाने लगा, जो कालांतर में देहरादून हो गया। आपको बता दूं, श्री गुरु राम राय महाराज की कर्मस्थली इसी देहरादून में वर्ष 1676 में चैत्र पंचमी को झंडा साहिब की गौरवशाली परंपरा का श्रीगणेश हुआ। संयोग से इसी दिन गुरु राम राय का जन्म दिन और इस दिन उन्होंने झंडास्थल पर डेरा डाला था। यह परंपरा आज विशाल वट वृक्ष का आकार ले चुकी है, जिसकी छांव में मानवता स्वयं को सुरक्षित महसूस करती है। झंडे जी का वैभव कायम रहे और उनकी छांव तले इंसानियत फूले-फले इसी पावन उद्देश्य की प्राप्ति के लिए 334 सालों से श्री गुरु राम राय महाराज के दरबार में हर वर्ष झंडा मेला आयोजित होता आ रहा है। भले ही तमाम मेलों में बदलाव आया हो, मगर यह मेला आज भी पुराने स्वरूप में बरकरार है। हजारों संगतें इसमें जुटती हैं, लेकिन वहां कोई भेदभाव नजर नहीं आता। कोई दिखावा नहीं। न कोई बडा न कोई छोटा और न कोई गरीब न कोई अमीर। दरबार साहिब में प्रतिष्ठित झंडे जी सिर्फ आस्था के प्रतीक ही नहीं, बल्कि उदासीन परंपरा के विजय स्तंभ भी है। यह साधारण ध्वजदंड न होकर ऐसा शक्तिपुंज है, जिससे नेमतें बरसती हैं। सैकडों वर्षाें का इतिहास समेटे करीब सौ फुट ऊंचे झंडे जी को उतारने और चढाने की प्रक्रिया स्वयं में अद्भुत है। जमीन पर रखे बगैर झंडे जी कब उतरे और कब चढ गए, किसी को ठीक से आभास भी नहीं हो पाता। यही इस मेले का अद्भुत क्षण है। उत्सव परंपरा का यह ऐसा विलक्षण अनुभव है, जिसकी मिसाल अन्यत्र देखने को नहीं मिलती। देश के विभिन्न भागों से बडी संख्या में श्रद्धालु इसमें जुटते हैं और मन्नतें मांगते हैं। श्रद्धा और विश्वास का भाव ही है, जो झंडा मेले को नई ऊंचाइयां प्रदान करता है, उतनी की वह भावनाओं में उतरता चला जाता है। चढते हैं तीन किस्म के गिलाफ झंडा साहिब में देहरादून की आत्मा बसती है। वजह यह कि दून का जन्म और विकास बहुत कुछ झंडा साहिब की परंपरा से जुडा है। झंडा मेले में झंडे जी पर गिलाफ चढाने की अनूठी परंपरा है। झंडे जी पर पहले सादे गिलाफ फिर शनील के गिलाफ और बाहर से दर्शनी गिलाफ चढता है। दर्शनी गिलाफ के ही दर्शन होते हैं। इस बार पांच मार्च से यह मेला शुरू होगा।

Saturday, February 20, 2010

जगत मंदिर है द्वारकाधीश

72खंभों पर टिका द्वारकाधीशमंदिर वास्तुकला का एक बेजोड नमूना है। क्या आप भी इस अद्भुत मंदिर का दर्शन करना चाहेंगे?

यदि द्वारकाभ्रमण करते हुए लगभग अस्सी फीट ऊंचा भवन और उसके गुंबद पर लहराती बेहद लंबी पताका आपको दूर से ही दिख जाए, तो समझ लीजिए कि आप द्वारकाधीशमंदिर के करीब पहुंच चुके हैं। यह मंदिर गुजरात के सौराष्ट्र जिले में स्थित है। यह वही द्वारकाहै, जहां श्रीकृष्ण महाभारत काल के दौरान वास करते थे। इसे हिंदुओं के चार पवित्र धामों में से एक माना जाता है। प्रचलित है कि श्रीकृष्ण ने द्वारकाको ही अपनी राजधानी बनाई थी।

[संगम स्थल] जब आप मंदिर के पास पहुंचते हैं, तो आपको नदी और समुद्र का संगम दिखाई देता है। दरअसल, द्वारकाधीशमंदिर गोमती नदी और अरब सागर के संगम स्थल पर स्थित है। यह जगत मंदिर भी कहलाता है, क्योंकि श्रीकृष्ण को संपूर्ण जगत का स्वामी माना गया है। इसका भवन पांच मंजिला है और यह 72खंभों पर टिका है। गुंबद पर लहराती हुई पताका पर सूर्य और चंद्रमा के चित्र अंकित हैं।

[मोक्ष और स्वर्ग द्वार] अमूमन मंदिरों में दुर्ग नहीं होते, मगर यहां यह देखकर आश्चर्य होता है कि इस मंदिर में एक बहुत ऊंचा दुर्ग और दर्शनार्थियोंके लिए एक विशाल भवन भी बना हुआ है। मंदिर में दो प्रवेश द्वार बने हैं। मुख्य द्वार मोक्ष द्वार और दक्षिणी द्वार स्वर्ग द्वार कहलाता है। इस द्वार से कुछ कदम आगे निकलने पर गोमती नदी के तट पर पहुंचा जा सकता है।

Saturday, December 19, 2009

मां लक्ष्मी की तपस्थली बेलवन

वृंदावन मथुरा के यमुना पार स्थित जहांगीरपुरग्राम (डांगौली/ मांट)का बेलवनलक्ष्मी देवी की तपस्थलीहै। यह स्थान अत्यंत सिद्ध है। यहां लक्ष्मी माता का भव्य मंदिर है। इस स्थान पर पौषमाह में चारो ओर लक्ष्मी माता की जय जयकार की गूंज सुनाई देने लग जाती है। दूर-दराज के असंख्य श्रद्धालु यहां अपनी सुख-समृद्धि के लिए पूजा-अर्चना करने आते हैं। यहां पौषमाह के प्रत्येक गुरुवार को विशाल मेला जुडता है। प्राचीन काल में इस स्थान पर बेल के वृक्षों की भरमार थी। इसी कारण यह स्थान बेलवनके नाम से प्रख्यात हुआ। कृष्ण-बलराम यहां अपने सखाओं के साथ गायें चराने आया करते थे। श्रीमद्भागवत में इस स्थान की महत्ता का विशद् वर्णन है। भविष्योत्तरपुराण में इसकी महिमा का बखान करते हुए लिखा है: तप: सिद्धि प्रदायैवनमोबिल्ववनायच।जनार्दन नमस्तुभ्यंविल्वेशायनमोस्तुते॥

भगवान् श्री कृष्ण ने जब सोलह हजार एक सौ आठ गोपिकाओं के साथ दिव्य महारासलीला की तब माता लक्ष्मी देवी के हृदय में भी इस लीला के दर्शन करने की इच्छा हुई और वह बेलवनजा पहुंची, परंतु उसमें गोपिकाओं के अतिरिक्त किसी अन्य व्यक्ति का प्रवेश वर्जित था। अत:उन्हें ललिता सखी ने यह कह कर दर्शन करने से रोक दिया कि आपका ऐश्वर्य लीला से सम्बन्ध है, जबकि वृंदावन माधुर्यमयीलीला का स्थान है। अत:लक्ष्मी माता वृंदावन की ओर अपना मुख करके भगवान् श्रीकृष्ण की आराधना करने लग गईं। भगवान् श्रीकृष्ण जब महारासलीला करके अत्यंत थक गए तब लक्ष्मी माता ने अपनी साडी से अग्नि प्रज्वलित कर उनके लिए खिचडी बनाई। इस खिचडी को खाकर भगवान् श्रीकृष्ण उनसे अत्यधिक प्रसन्न हुए।

लक्ष्मी माता ने जब भगवान् श्रीकृष्ण से ब्रज में रहने की अनुमति मांगी तो उन्होंने उन्हें सहर्ष अनुमति प्रदान कर दी। यह घटना पौषमाह के गुरुवार की है। कालान्तर में इस स्थान पर लक्ष्मी माता का भव्य मंदिर स्थापित हुआ। इस मंदिर में मां लक्ष्मी वृंदावन की ओर मुख किए हाथ जोडे विराजितहैं।

साथ ही खिचडी महोत्सव आयोजित करने की परम्परा भी पडी। इसी सब के चलते अब यहां स्थित लक्ष्मी माता मंदिर में खिचडी से ही भोग लगाए जाने की ही परंपरा है। यहां पौषमाह में प्रत्येक गुरुवार को जगह-जगह असंख्य भट्टियां चलती हैं। साथ ही हजारों भक्त-श्रद्धालु सारे दिन खिचडी के बडे-बडे भण्डारे करते हैं। इस मंदिर दर्शन हेतु पौषमाह के अलावा भी वर्ष भर भक्त-श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। ब्रज चौरासी कोस की हरेक परिक्रमा भी इस स्थान पर अनिवार्य रूप से आती है।

Saturday, October 17, 2009

धनतेरस की पूजा से विशेष लाभ

धनतेरस के दिन भगवान कुबेर और लक्ष्मी की पूजा का विशेष महत्व है। इस पूजा से भगवती लक्ष्मी प्रसन्न होकर आर्थिक संपन्नता और ऐश्वर्य प्रदान करती हैं। भगवान धनवंतरी का जन्मोत्सव होने के कारण इस दिन का विशेष महत्व है। आयुर्वेद के जनक भगवान धनवंतरी की पूजा-अर्चना आरोग्य प्रदान करती है। ज्योतिषाचार्य अशोक उपाध्याय पाराशर के अनुसार इस दिन संचित की गई जडी-बूटियां अमृत के समान जीवन का कायाकल्प करती हैं। धनदा त्रयोदशी जिसे धनतेरस भी कहते हैं का पर्व भारत में धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन सायंकाल में दीप दान किया जाता है तथा धनाधिपति भगवान कुबेर एवं गौरी-गणेश की पूजा श्रद्धा भाव से की जाती है। इस दिन अन्नपूर्ण स्तोत्र एवं कनकधारा स्तोत्र का पाठ करने का विधान भी है। सायंकालीन दीप दान अपमृत्यु [अकाल मृत्यु] के निर्वाणार्थ किया जाता है। इस दीप दान से पूर्वज खुश होते हैं और अपने वंशजों को आशीर्वाद देते हैं। जैसा कि शास्त्र विदित है:- मृत्युनापाश दण्डाभ्याम् कालेन श्यामयासह, ˜योदश्याम् दीपदानात् सूर्यज: प्रीयतांमम्।। अर्थात् यमपाश से मुक्ति पितर प्रसन्नता, विपरीत भाग्य से रक्षा एवं अकाल मृत्यु से बचने हेतु धनतेरस एवं यम द्वितीया को दीप दान अवश्य करना चाहिए। इस दिन स्थित लगन में बहुमूल्य रत्न एवं धातु, जवाहरात खरीदने का विशेष महत्व है। सोना-चांदी की खरीद से घर में समृद्धि बनी रहती है तथा देवी लक्ष्मी अति प्रसन्न होती हैं। बर्तन खरीदने की परंपरा भी रही है, लेकिन लौह पात्र या स्टेनलेस स्टील आदि के बर्तन खरीदने का कोई शास्त्र सम्मत प्रमाण नहीं मिलता। धनतेरस का महत्व इस दिन आयुर्वेद के जनक भगवान धनवंतरी की शुभ जयंती के कारण भी महत्व रखता है। करोडों दोषों एवं नवग्रह दोष से मुक्ति प्रदान करने वाला देवाधिदेव महादेव की प्रसन्नता हेतु प्रदोष व्रत भी इसी दिन रखा जाता है। लक्ष्मी की कृपा के लिए अष्टदल कमल बनाकर कुबेर, लक्ष्मी एवं गणेश जी की स्थापना कर उपासना की जाती है। इस अनुष्ठान में पांच घी के दीपक जलाकर तथा कमल, गुलाब आदि पुष्पों से उत्तर दिशा की ओर मुख करके पूजन करना लाभप्रद होता है। इसके अलावा ओम् श्रीं श्रीयै नम: का जाप करना चाहिए। इस दिन अपने इष्टदेव की पूजा एवं मंत्रजाप विशेष फलदायी होता है।

धनतेरस की पूजा से विशेष लाभ

धनतेरस के दिन भगवान कुबेर और लक्ष्मी की पूजा का विशेष महत्व है। इस पूजा से भगवती लक्ष्मी प्रसन्न होकर आर्थिक संपन्नता और ऐश्वर्य प्रदान करती हैं। भगवान धनवंतरी का जन्मोत्सव होने के कारण इस दिन का विशेष महत्व है। आयुर्वेद के जनक भगवान धनवंतरी की पूजा-अर्चना आरोग्य प्रदान करती है। ज्योतिषाचार्य अशोक उपाध्याय पाराशर के अनुसार इस दिन संचित की गई जडी-बूटियां अमृत के समान जीवन का कायाकल्प करती हैं। धनदा त्रयोदशी जिसे धनतेरस भी कहते हैं का पर्व भारत में धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन सायंकाल में दीप दान किया जाता है तथा धनाधिपति भगवान कुबेर एवं गौरी-गणेश की पूजा श्रद्धा भाव से की जाती है। इस दिन अन्नपूर्ण स्तोत्र एवं कनकधारा स्तोत्र का पाठ करने का विधान भी है। सायंकालीन दीप दान अपमृत्यु [अकाल मृत्यु] के निर्वाणार्थ किया जाता है। इस दीप दान से पूर्वज खुश होते हैं और अपने वंशजों को आशीर्वाद देते हैं। जैसा कि शास्त्र विदित है:- मृत्युनापाश दण्डाभ्याम् कालेन श्यामयासह, ˜योदश्याम् दीपदानात् सूर्यज: प्रीयतांमम्।। अर्थात् यमपाश से मुक्ति पितर प्रसन्नता, विपरीत भाग्य से रक्षा एवं अकाल मृत्यु से बचने हेतु धनतेरस एवं यम द्वितीया को दीप दान अवश्य करना चाहिए। इस दिन स्थित लगन में बहुमूल्य रत्न एवं धातु, जवाहरात खरीदने का विशेष महत्व है। सोना-चांदी की खरीद से घर में समृद्धि बनी रहती है तथा देवी लक्ष्मी अति प्रसन्न होती हैं। बर्तन खरीदने की परंपरा भी रही है, लेकिन लौह पात्र या स्टेनलेस स्टील आदि के बर्तन खरीदने का कोई शास्त्र सम्मत प्रमाण नहीं मिलता। धनतेरस का महत्व इस दिन आयुर्वेद के जनक भगवान धनवंतरी की शुभ जयंती के कारण भी महत्व रखता है। करोडों दोषों एवं नवग्रह दोष से मुक्ति प्रदान करने वाला देवाधिदेव महादेव की प्रसन्नता हेतु प्रदोष व्रत भी इसी दिन रखा जाता है। लक्ष्मी की कृपा के लिए अष्टदल कमल बनाकर कुबेर, लक्ष्मी एवं गणेश जी की स्थापना कर उपासना की जाती है। इस अनुष्ठान में पांच घी के दीपक जलाकर तथा कमल, गुलाब आदि पुष्पों से उत्तर दिशा की ओर मुख करके पूजन करना लाभप्रद होता है। इसके अलावा ओम् श्रीं श्रीयै नम: का जाप करना चाहिए। इस दिन अपने इष्टदेव की पूजा एवं मंत्रजाप विशेष फलदायी होता है।

श्रीराम भक्ति के द्वितीय आचार्य हैं हनुमान लला

भगवान श्रीराम के चरणों में जितना अनुराग श्री हनुमान का है उतना अन्य किसी का नहीं। एकादश रुद्र के अवतार के रूप में स्वयं भगवान शिव ने श्रीराम के चरणों की सेवा की अपनी कामना को पूरा करने के लिए हनुमान के रूप में अवतार लिया। वे सदैव श्रीराम के चरणों में कैंकर्य करते हैं। वहां से विरत होने के बाद समाधिस्थ हनुमान मानसिक रूप से श्रीराम के पद पंकज की सेवा करते हैं। गोस्वामी तुलसी दास ने श्री हनुमान की श्रीराम भक्ति को इस प्रकार सम्मानित किया है। हनुमान सम नहि बड भागी, नहि कोऊ रामचरन अनुरागी। श्रीराम भक्ति की प्रथम आचार्य स्वयं माता जानकी है, उन्होंने श्री हनुमान की रामभक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें आठों प्रकार की सिद्धि व नौ निधियों के साथ-साथ श्रीराम महामंत्र प्रदान किया। इस तरह श्री हनुमान रामभक्ति के द्वितीय आचार्य हुए। उन्हें श्रीराम भक्ति का प्रथम प्रचारक होने का भी गौरव प्राप्त हैं। मानस में गोस्वामी जी ने भगवान शिव के हनुमान अवतार पर इस तरह प्रकाश डाला है। वे लिखते हैं पुरखा ते सेवक भये, हर ते भये हनुमान। अखिल भारतीय षड्दर्शन अखाड परिषद अध्यक्ष महंत ज्ञानदास कहते हैं किभगवान श्रीराम ने धरा धाम पर अपनी समस्त शक्तियों सहित अवतार लिया। स्वयं ब्रह्मा जामवन्त के रूप में अवतरित हुए जबकि हनुमान जी स्वयं शिव के अवतार हैं। उन्होंने कहा कि श्रीराम हमेशा शिव की पूजा करते रहते थे इससे शिव के मन श्रीराम चरणों के पूजन की जो इच्छा शेष थी, उसे उन्होंने श्री हनुमान के रूप में पूरा किया। इस प्रकार श्री हनुमान द्वारा प्रचारित श्रीराम भक्ति से आज संपूर्ण विश्व आलोकित हैं। श्रीराम महामंत्र हनुमान जी से श्री ब्रह्मा, वशिष्ठ, पाराशर, व्यास, शुकदेव, बोधायनाचार्य आदि से होकर रामानंदाचार्य तक पहुंचा। उन्होंने कबीर, रैदास, दादू आदि अपने द्वादश शिष्यों के जरिये श्रीराम भक्ति को जाति-पांति के बंधनों से मुक्त कर आम जन तक पहुंचाया। अखिल भारतीय त्रय अनी अखाडों के प्रधानमंत्री माधव दास कहते हैं कि हनुमानगढी में विराजमान हनुमानजी स्वयं श्रीराम द्वारा स्थापित हैं। चौकी हनुमत बीर के रूप में श्रीराम द्वारा स्थापित यह पीठ भक्तों के सदैव श्री हनुमान का साक्षात वास होने का अनुभव कराती है। जब तक धरा धाम पर रामनाम व रामायण रहेगी तब तक श्री हनुमान हनुमानगढी में साक्षात वास कर भक्तों के मनोरथों को पूरा करेंगे।

Monday, October 12, 2009

राधाकुंड पुण्य प्रदाता

ब्रजमंडलमें भगवान श्रीकृष्ण और भगवती राधा की लीलाओं के अनेक स्थान हैं। उनमें राधा-कुंड की बडी चर्चा और महिमा सुनने को मिलती है। वैसे, यहां साल भर तीर्थयात्री आते रहते हैं, लेकिन कार्तिक मास के कृष्णपक्ष की अष्टमी की अ‌र्द्धरात्रि में हजारों लोग बडी श्रद्धा से उसमें स्नान करते हैं। मान्यता है कि कार्तिक-कृष्ण-अष्टमी की मध्यरात्रि में ही राधाकुंडबना था। राधा का परिहास कहते हैं कि द्वापर युग में कंस ने वृष [सांड] रूपधारीअरिष्टासुरको श्रीकृष्ण का वध करने के लिए गोकुल भेजा था। भला भगवान को कौन मार सकता है, उल्टे श्रीकृष्ण ने ही अरिष्टासुरको मार डाला। अरिष्टासुरका वध करने के बाद जब योगेश्वर श्रीकृष्ण रात्रि में रासलीला के लिए निकुंज पहुंचे, तब गोपियों से घिरीं राधाजीने उनसे परिहास किया, आज तुमने एक सांड [गोवंश] की हत्या की है, इसलिए तुम्हें गोहत्या का पाप लगा है। पृथ्वी के सभी तीर्थो में स्नान करने के बाद ही तुम दोष-मुक्त हो सकोगे। तुम्हारे शुद्ध होने पर ही हम लोग तुम्हारे साथ रासलीला में भाग लेंगे। इस पर श्रीकृष्ण बोले, मैं ब्रज छोडकर अन्यत्र कहीं नहीं जाऊंगा। मैं सभी तीर्थो को ब्रज में बुला लेता हूं। ऐसा कहकर श्रीकृष्ण ने अपने पैर की एडी की चोट से एक विशाल कुंड का निर्माण किया और उसमें पृथ्वी के सब तीर्थो का आह्वान किया।

कहते हैं कि सभी तीर्थ जल रूप में उस कुंड में प्रवेश कर गए। तीर्थो के निर्मल जल से परिपूर्ण वह कुंड श्यामकुंड के नाम से प्रसिद्ध हो गया। श्रीकृष्ण उस कुंड में स्नान करके राधारानीके सामने इठलाते हुए पहुंचे, तो वे तुनककर सखियों के साथ पास में ही अपने हाथ के कंगन की सहायता से एक अन्य कुंड बनाने में जुट गई।

राधारानीका कुंड तैयार हो गया, लेकिन उसमें जल न था। सरोवर में पानी भरने के लिए उन्होंने सखियों के साथ ब्रज के अन्य जलाशयों से पानी लाने का विचार किया। इधर श्यामकुंडमें उपस्थित तीर्थो के हृदय में यह भावना उठी कि उन्हें राधाजीके बनाए कुंड में भी स्थान मिल जाए, तभी ब्रज में उनका आगमन सार्थक होगा। भगवान श्रीकृष्ण तीर्थो की मनोकामना जान गए। उन्होंने तीर्थो को इसकी अनुमति मांगने के लिए राधाजीसे स्वयं प्रार्थना करने को कहा। तीर्थो की आराधना से प्रसन्न होकर भगवती राधा ने उन्हें अपने कुंड में आने की अनुमति दे दी। करुणामयी देवी की स्वीकृति पाते ही आनन-फानन में सभी तीर्थ श्यामकुंडकी सीमा तोडकर राधाकुंड में प्रवेश पा गए। श्यामकुंडकी तरह राधाकुंडभी सब तीर्थो के जल से भर गया। कालीखेतऔर गौरीखेत द्वापरयुगमें बने राधाकुंडऔर श्यामकुंडश्रीकृष्ण के द्वारकाजाने के बाद लुप्त हो गए। उनके प्रपौत्र [परपोते] महाराज वज्रनाभने शांडिल्य ऋषि के मार्गदर्शन में इन कुंडों का उद्धार किया, लेकिन कालान्तर में ये दोनों कुंड पुन:लुप्त हो गए। आज से 493वर्ष पूर्व विक्रम संवत 1573में जब श्रीचैतन्यमहाप्रभु ब्रजमंडलकी यात्रा करते हुए यहां पधारे, तब उन्होंने स्थानीय लोगों से इन दोनों कुंडों के बारे में पूछा।

ग्रामीणों ने उन्हें बताया कि यहां कालीखेतएवगौरीखेतहैं, जहां कुछ जल है। कहा जाता है कि महाप्रभु ने अपनी दिव्यदृष्टि से देखा, तो पहचान गए कि कालीखेतश्यामकुंडऔर गौरीखेतराधाकुंडहैं। चैतन्य महाप्रभु के निज धाम जाने के बाद जगन्नाथपुरीसे श्रीरघुनाथदासगोस्वामी राधाकुंडआकर भजन करने लगे। एक समय मुगल सम्राट अकबर अपनी सेना के साथ इस रास्ते से कहीं जा रहे थे। सैनिक और जानवर बहुत प्यासे थे। बादशाह ने गोस्वामी जी से पानी के विषय में पूछा, तो उन्होंने कालीखेतऔर गौरीखेतकी ओर इशारा किया। अकबर ने वहां देखा, तो उसे लगा कि इतने छोटे सरोवरों से उसकी सेना की प्यास नहीं बुझ सकेगी। यह देखकर आश्चर्यचकित हो गया कि संपूर्ण सेना और जानवरों के पानी पी लेने के बाद भी इसमें जल का स्तर जरा भी नहीं गिरा। आहा वोही राधाकुंडके निर्माण के समय राधारानीके साथ जुटी गोपियों ने उत्साहित होकर मुख से आहा वोहीशब्द का उच्चारण किया, जो बाद में अपभ्रंशहोकर अहोई बोला जाने लगा। राधाकुंडका निर्माण कार्तिक-कृष्ण-अष्टमी की अ‌र्द्धरात्रि में होने के कारण यह तिथि अहोई अष्टमी कहलाई। इसका दूसरा नाम बहुला अष्टमी भी है। राजसूय यह कुंड भगवान कृष्ण को भी अतिप्रियहै।