मनुष्य अपनी इंद्रियों के माध्यम से संसार के नाना प्रकार के आकर्षणों से युक्त रूप, रस, शब्द, गंध व स्पर्श द्वारा विषयों का आस्वादन लेते हुए स्वास्थ्य, सुख और शांति की मृगमरीचिका में आजीवन विचरण करता रहता है। उसे स्वास्थ्य, सुख और शांति के बदले बार-बार शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक व आत्मिक बेचैनी, चिंता व तनाव से जूझते रहना पडता है। चंचल मन, जिसे नियंत्रित करना वायु को नियंत्रित करने के समान दुष्कर है, वह इंद्रियों पर नियंत्रण नहीं रख पाता। बुद्धि, इंद्रियों के विषयोन्मुखहोने के दुष्परिणाम जानते हुए भी न तो मन को रोक पाती है न इंद्रियों को।
सामान्य मनुष्य न तो सक्षम गुरुओं के संपर्क में होता है, न शास्त्रों के अध्ययन के द्वारा ही ज्ञानयोग, भक्तियोग,कर्मयोग, राजयोग, हठयोग को जीवन में अपना पाता है। ऐसी स्थिति में वह क्या करे? ऐसी स्थिति में सबसे पहले अपने भोजन पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि भोजन का सीधा प्रभाव मन और विचारों पर पडता है। कहते हैं जैसा खाओ अन्न, वैसा बनेगा मन। गीता में तीन प्रकार का भोजन बतलाया गया है- सात्विक, राजसी और तामसी। इनके अनुसार ही मन की प्रवृत्तियां और विचार बनते हैं। इन्हीं के अनुरूप हम वाणी से बोलते हैं और उन्हीं से प्रेरित होकर आचरण करते हैं। हम जैसा आचरण करते हैं उसका तद्नुरूपपरिणाम भी सुख, दु:ख, स्वास्थ्य अथवा बीमारी और कष्ट के रूप में प्राप्त करते हैं। तामसी भोजन करने वाला निश्चित रूप से आलसी, प्रमादी और अकर्मण्य होगा। राजसी भोजन करने वाले व्यक्ति में विलासी, क्रोधी, झगडालू प्रवृत्ति वाला होने, स्वादिष्ट होने की वजह से अधिक भोजन खाने की आदत वाला होने के कारण बार-बार अस्वस्थ होने की संभावना होती है। इसी प्रकार सात्विक भोजन के प्रभाव से मनुष्य श्रेष्ठ विचारों, सद्ग्रंथोंऔर सत्पुरुषों की ओर प्रेरित होता है। सदाचार, शांत, स्वभाव, स्वस्थ शरीर, रोगों से मुक्ति सात्विक भोजन के परिणाम होते हैं। उस व्यक्ति की कार्यक्षमता में वृद्धि होती है। उसके पारिवारिक एवं सामाजिक परिवेश में शांति और सामंजस्य होता है। मनुष्य का जीवन धृति, क्षमा, दमो, अस्तेयम्धर्म के दस लक्षणों को धारण करने योग्य बनकर शांति और आनंद प्राप्त करने की क्षमता से संपन्न हो सकेगा।
Saturday, June 5, 2010
Tuesday, May 11, 2010
मंगलमय विधान
जो चाहते हैं सो होता नहीं, जो होता है सो भाता नहीं और जो भाता है सो रहता नहीं-यही व्यक्ति की विवशता है। वास्तव में जो व्यक्ति का किया हुआ नहीं है, विधान से स्वत:हो रहा है, वह किसी के लिए अहितकर नहीं है। विधान से स्वत:क्या हो रहा है?-प्रत्येक उत्पत्तिका विनाश हो रहा है, प्रत्येक संयोग वियोग में बदल रहा है, और प्रत्येक जन्म मृत्यु में बदल रहा है। सृष्टि में निरंतर परिवर्तन हो रहा है। इस परिवर्तन का कर्ता कोई व्यक्ति नहीं है,अपितु सब कुछ किसी विधान से स्वत:हो रहा है। सृष्टि में अनवरत गति है, स्थायित्व नहीं है। इस वैधानिक तथ्य के प्रति सजग होते ही सृष्टि [प्रतीति] से अतीत के जीवन की खोज तथा सतत् परिवर्तनशील दृश्यों की लुभावनी कलाकृति के कुशल कलाकार में आस्था आरंभ हो जाती है। अव्यक्तिजब व्यक्त हुआ है तो इस व्यक्त का नयापन बना रहे, इसकी अविच्छन्नताबनी रहे, इसके लिए परिवर्तन अनिवार्य है। इस दृष्टि से जो भी हो रहा है, वह स्वाभाविक लगने लगता है। किंतु प्रमादवश जब व्यक्ति जगत के सीमित सौंदर्य में फंसकर उसका सुख भोगने लगता है,जब उसे विवश होकर दु:ख भोगना पडता है, तब वह जीवन के मंगलकारी विधान को अमंगलकारीकहने लगता है। इसी भूल के कारण वह दु:खी होता है। जिस विधान से मानव को विवेक का प्रकाश मिला है, उसी विधान से मानव को प्राप्त विवेक का आदर या अनादर करने की स्वाधीनता भी मिली है। जब व्यक्ति मिली स्वाधीनता का दुरुपयोग करना बंद कर देता है, त्यों ही उसका विकास आरंभ हो जाता है, यही विधान है। मानव को यदि विधान से स्वाधीनता न मिली होती, तो उसे भासही नहीं होता और उसकी अपनी रचना का उद्देश्य अपूर्ण रह जाता। रचयिता ने मानव को क्रियाशक्ति,विचारशक्ति और भावशक्तिइसीलिए दी है कि वह जगत की सेवा, सत्य की खोज कर सके। सृष्टि के सौंदर्य की अनुभूति और सृष्टिकर्ता के माधुर्य के सौंदर्य के रस की अनभूतिकरने में मानव ही समर्थ है। मानव के जीवन में सामर्थ्य के सदुपयोग से जो विकास होता है वही विकास असमर्थता की पीडा से भी होता है। विधान में समर्थ और असमर्थ दोनों का हित समान रूप से निहित है।
Saturday, April 17, 2010
अभिमान का त्याग करने से ही मिलता है सच्चा सुख
सुख-दुख जीवन के दो पहलू है। सुख के अंदर दुख भी निहित होता है। मगर इंसान केवल सुख चाहता है और दुख से दूर भागता है, जबकि जीवन की सचाई यह है कि हर सुख के पीछे दुख और दुख के पीछे सुख छिपा होता है। परमात्मा की प्राप्ति जीवन का लक्ष्य है और इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए मनुष्य को पुरुषार्थ के मार्ग पर चलना होगा। पुरुषार्थ करते हुए सत्य को जीवन में धारण करना होगा। अंतरमुखीहोने से ही मनुष्य उस परम शांति को प्राप्त कर सकता है, जब तक राग द्वेष आदि बुराइयां मनुष्य के साथ लगी हुई है। तब तक घर में रहकर भी कारागार जैसा अनुभव होता है। श्रद्धा समस्त ज्ञान का मूल सूत्र है। श्रद्धा होने पर दुर्गम ज्ञान भी सुगम हो जाता है। हमें यह जन्म आत्मा के कल्याण के लिए मिला है और आत्म कल्याण की चाह ही श्रद्धा उत्पन्न करती है।
मनुष्य शरीर पाकर भी यदि परमात्मा की प्राप्ति नही हुई तो मानो यह जन्म व्यर्थ ही गया, जो मनुष्य आत्म कल्याण कार्यो को छोडकर संसार के फंदे में फंस रहा है उससे बडा अज्ञानी कौन हो सकता है। लिहाजा जिस काम के लिए आए है उसे अवश्य पूरा कर लेना चाहिए। गीता में भगवान ने कहा है कि अज्ञानी लोग मेरे परम भाव को नही जानते, जिस कारण जन्म मरण को प्राप्त हो जाते है तथा मै अव्यक्त होते हुए भी अपने भक्तों को अनुग्रह करने के लिए व्यक्त हो जाता हूं।
सदाचारी स्वयं अपने आप में खो जाता है। मन की ऊर्जा को काम में नही राम में लगाना, भोग में नही योग में लगाना, वासना को समाधि में लगाना तो मन भी स्वस्थ रहेगा व शरीर में स्वस्थ मन बना रहेगा। इसलिए गुरु भक्तों का फरमान है कि सदाचारी हमेशा ऊपर बैठता है। इसलिए मानव को हमेशा सदाचार का पालन करना चाहिए।
भक्त भगवान का प्रिय होता है और भक्त का बैरी भगवान का बैरी होता है। इसलिए भक्त को भगवान में अपनी प्रीति रखनी चाहिए। प्रभु को उनका सेवक परमप्रिय है। जो मनुष्य उनके सेवक का अहित करने का विचार अपने मन में भी लाता है ,उसका लोक व परलोक दोनो में ही अहित हो जाता है।
मनुष्य शरीर पाकर भी यदि परमात्मा की प्राप्ति नही हुई तो मानो यह जन्म व्यर्थ ही गया, जो मनुष्य आत्म कल्याण कार्यो को छोडकर संसार के फंदे में फंस रहा है उससे बडा अज्ञानी कौन हो सकता है। लिहाजा जिस काम के लिए आए है उसे अवश्य पूरा कर लेना चाहिए। गीता में भगवान ने कहा है कि अज्ञानी लोग मेरे परम भाव को नही जानते, जिस कारण जन्म मरण को प्राप्त हो जाते है तथा मै अव्यक्त होते हुए भी अपने भक्तों को अनुग्रह करने के लिए व्यक्त हो जाता हूं।
सदाचारी स्वयं अपने आप में खो जाता है। मन की ऊर्जा को काम में नही राम में लगाना, भोग में नही योग में लगाना, वासना को समाधि में लगाना तो मन भी स्वस्थ रहेगा व शरीर में स्वस्थ मन बना रहेगा। इसलिए गुरु भक्तों का फरमान है कि सदाचारी हमेशा ऊपर बैठता है। इसलिए मानव को हमेशा सदाचार का पालन करना चाहिए।
भक्त भगवान का प्रिय होता है और भक्त का बैरी भगवान का बैरी होता है। इसलिए भक्त को भगवान में अपनी प्रीति रखनी चाहिए। प्रभु को उनका सेवक परमप्रिय है। जो मनुष्य उनके सेवक का अहित करने का विचार अपने मन में भी लाता है ,उसका लोक व परलोक दोनो में ही अहित हो जाता है।
Saturday, March 6, 2010
दून की आत्मा
मैं समय हूं। मैंने वह सबकुछ देखा व महसूस किया है, जो आज अतीत का हिस्सा है। मैंने उस कालखंड को भी देखा है कि जब सिखों के सातवें गुरु श्री गुरु हर राय ने अपने पुत्र बाबा रामराय को त्याग दिया था। खैर..यह सब होनी थी, जो अच्छे के लिए हो रही थी। मुझे याद है वह दिन जब वर्ष 1676 में श्री गुरु राम राय जी के कदम दून घाटी में पडे। मुगल बादशाह औरंगजेब श्री गुरु राम राय से बेहद प्रभावित था। जब उसे पता चला कि गुरु रामराय दूनघाटी में आ गए हैं, उसने गढवाल के तत्कालीन राजा फतेहशाह को उनकी हर संभव सहायता करने को कहा। फतेहशाह ने गुरु जी के दर्शन किए और उनसे यहीं रहने की प्रार्थना की। उसी समय राजा ने उन्हें तीन गांव खुडबुडा, राजपुर व चामासारी दान में दिए। बाद में राजा फतेहशाह के पोते प्रदीप शाह ने चार और गांव धामावाला, मियांवाला, पंडितवाडी व छरतावाला गुरु महाराज को दिए। श्री गुरु रामराय जी के डेरा स्थापित करने पर इसे डेरा दून कहा जाने लगा, जो कालांतर में देहरादून हो गया। आपको बता दूं, श्री गुरु राम राय महाराज की कर्मस्थली इसी देहरादून में वर्ष 1676 में चैत्र पंचमी को झंडा साहिब की गौरवशाली परंपरा का श्रीगणेश हुआ। संयोग से इसी दिन गुरु राम राय का जन्म दिन और इस दिन उन्होंने झंडास्थल पर डेरा डाला था। यह परंपरा आज विशाल वट वृक्ष का आकार ले चुकी है, जिसकी छांव में मानवता स्वयं को सुरक्षित महसूस करती है। झंडे जी का वैभव कायम रहे और उनकी छांव तले इंसानियत फूले-फले इसी पावन उद्देश्य की प्राप्ति के लिए 334 सालों से श्री गुरु राम राय महाराज के दरबार में हर वर्ष झंडा मेला आयोजित होता आ रहा है। भले ही तमाम मेलों में बदलाव आया हो, मगर यह मेला आज भी पुराने स्वरूप में बरकरार है। हजारों संगतें इसमें जुटती हैं, लेकिन वहां कोई भेदभाव नजर नहीं आता। कोई दिखावा नहीं। न कोई बडा न कोई छोटा और न कोई गरीब न कोई अमीर। दरबार साहिब में प्रतिष्ठित झंडे जी सिर्फ आस्था के प्रतीक ही नहीं, बल्कि उदासीन परंपरा के विजय स्तंभ भी है। यह साधारण ध्वजदंड न होकर ऐसा शक्तिपुंज है, जिससे नेमतें बरसती हैं। सैकडों वर्षाें का इतिहास समेटे करीब सौ फुट ऊंचे झंडे जी को उतारने और चढाने की प्रक्रिया स्वयं में अद्भुत है। जमीन पर रखे बगैर झंडे जी कब उतरे और कब चढ गए, किसी को ठीक से आभास भी नहीं हो पाता। यही इस मेले का अद्भुत क्षण है। उत्सव परंपरा का यह ऐसा विलक्षण अनुभव है, जिसकी मिसाल अन्यत्र देखने को नहीं मिलती। देश के विभिन्न भागों से बडी संख्या में श्रद्धालु इसमें जुटते हैं और मन्नतें मांगते हैं। श्रद्धा और विश्वास का भाव ही है, जो झंडा मेले को नई ऊंचाइयां प्रदान करता है, उतनी की वह भावनाओं में उतरता चला जाता है। चढते हैं तीन किस्म के गिलाफ झंडा साहिब में देहरादून की आत्मा बसती है। वजह यह कि दून का जन्म और विकास बहुत कुछ झंडा साहिब की परंपरा से जुडा है। झंडा मेले में झंडे जी पर गिलाफ चढाने की अनूठी परंपरा है। झंडे जी पर पहले सादे गिलाफ फिर शनील के गिलाफ और बाहर से दर्शनी गिलाफ चढता है। दर्शनी गिलाफ के ही दर्शन होते हैं। इस बार पांच मार्च से यह मेला शुरू होगा।
Saturday, February 20, 2010
जगत मंदिर है द्वारकाधीश
72खंभों पर टिका द्वारकाधीशमंदिर वास्तुकला का एक बेजोड नमूना है। क्या आप भी इस अद्भुत मंदिर का दर्शन करना चाहेंगे?
यदि द्वारकाभ्रमण करते हुए लगभग अस्सी फीट ऊंचा भवन और उसके गुंबद पर लहराती बेहद लंबी पताका आपको दूर से ही दिख जाए, तो समझ लीजिए कि आप द्वारकाधीशमंदिर के करीब पहुंच चुके हैं। यह मंदिर गुजरात के सौराष्ट्र जिले में स्थित है। यह वही द्वारकाहै, जहां श्रीकृष्ण महाभारत काल के दौरान वास करते थे। इसे हिंदुओं के चार पवित्र धामों में से एक माना जाता है। प्रचलित है कि श्रीकृष्ण ने द्वारकाको ही अपनी राजधानी बनाई थी।
[संगम स्थल] जब आप मंदिर के पास पहुंचते हैं, तो आपको नदी और समुद्र का संगम दिखाई देता है। दरअसल, द्वारकाधीशमंदिर गोमती नदी और अरब सागर के संगम स्थल पर स्थित है। यह जगत मंदिर भी कहलाता है, क्योंकि श्रीकृष्ण को संपूर्ण जगत का स्वामी माना गया है। इसका भवन पांच मंजिला है और यह 72खंभों पर टिका है। गुंबद पर लहराती हुई पताका पर सूर्य और चंद्रमा के चित्र अंकित हैं।
[मोक्ष और स्वर्ग द्वार] अमूमन मंदिरों में दुर्ग नहीं होते, मगर यहां यह देखकर आश्चर्य होता है कि इस मंदिर में एक बहुत ऊंचा दुर्ग और दर्शनार्थियोंके लिए एक विशाल भवन भी बना हुआ है। मंदिर में दो प्रवेश द्वार बने हैं। मुख्य द्वार मोक्ष द्वार और दक्षिणी द्वार स्वर्ग द्वार कहलाता है। इस द्वार से कुछ कदम आगे निकलने पर गोमती नदी के तट पर पहुंचा जा सकता है।
यदि द्वारकाभ्रमण करते हुए लगभग अस्सी फीट ऊंचा भवन और उसके गुंबद पर लहराती बेहद लंबी पताका आपको दूर से ही दिख जाए, तो समझ लीजिए कि आप द्वारकाधीशमंदिर के करीब पहुंच चुके हैं। यह मंदिर गुजरात के सौराष्ट्र जिले में स्थित है। यह वही द्वारकाहै, जहां श्रीकृष्ण महाभारत काल के दौरान वास करते थे। इसे हिंदुओं के चार पवित्र धामों में से एक माना जाता है। प्रचलित है कि श्रीकृष्ण ने द्वारकाको ही अपनी राजधानी बनाई थी।
[संगम स्थल] जब आप मंदिर के पास पहुंचते हैं, तो आपको नदी और समुद्र का संगम दिखाई देता है। दरअसल, द्वारकाधीशमंदिर गोमती नदी और अरब सागर के संगम स्थल पर स्थित है। यह जगत मंदिर भी कहलाता है, क्योंकि श्रीकृष्ण को संपूर्ण जगत का स्वामी माना गया है। इसका भवन पांच मंजिला है और यह 72खंभों पर टिका है। गुंबद पर लहराती हुई पताका पर सूर्य और चंद्रमा के चित्र अंकित हैं।
[मोक्ष और स्वर्ग द्वार] अमूमन मंदिरों में दुर्ग नहीं होते, मगर यहां यह देखकर आश्चर्य होता है कि इस मंदिर में एक बहुत ऊंचा दुर्ग और दर्शनार्थियोंके लिए एक विशाल भवन भी बना हुआ है। मंदिर में दो प्रवेश द्वार बने हैं। मुख्य द्वार मोक्ष द्वार और दक्षिणी द्वार स्वर्ग द्वार कहलाता है। इस द्वार से कुछ कदम आगे निकलने पर गोमती नदी के तट पर पहुंचा जा सकता है।
Saturday, December 19, 2009
मां लक्ष्मी की तपस्थली बेलवन
वृंदावन मथुरा के यमुना पार स्थित जहांगीरपुरग्राम (डांगौली/ मांट)का बेलवनलक्ष्मी देवी की तपस्थलीहै। यह स्थान अत्यंत सिद्ध है। यहां लक्ष्मी माता का भव्य मंदिर है। इस स्थान पर पौषमाह में चारो ओर लक्ष्मी माता की जय जयकार की गूंज सुनाई देने लग जाती है। दूर-दराज के असंख्य श्रद्धालु यहां अपनी सुख-समृद्धि के लिए पूजा-अर्चना करने आते हैं। यहां पौषमाह के प्रत्येक गुरुवार को विशाल मेला जुडता है। प्राचीन काल में इस स्थान पर बेल के वृक्षों की भरमार थी। इसी कारण यह स्थान बेलवनके नाम से प्रख्यात हुआ। कृष्ण-बलराम यहां अपने सखाओं के साथ गायें चराने आया करते थे। श्रीमद्भागवत में इस स्थान की महत्ता का विशद् वर्णन है। भविष्योत्तरपुराण में इसकी महिमा का बखान करते हुए लिखा है: तप: सिद्धि प्रदायैवनमोबिल्ववनायच।जनार्दन नमस्तुभ्यंविल्वेशायनमोस्तुते॥
भगवान् श्री कृष्ण ने जब सोलह हजार एक सौ आठ गोपिकाओं के साथ दिव्य महारासलीला की तब माता लक्ष्मी देवी के हृदय में भी इस लीला के दर्शन करने की इच्छा हुई और वह बेलवनजा पहुंची, परंतु उसमें गोपिकाओं के अतिरिक्त किसी अन्य व्यक्ति का प्रवेश वर्जित था। अत:उन्हें ललिता सखी ने यह कह कर दर्शन करने से रोक दिया कि आपका ऐश्वर्य लीला से सम्बन्ध है, जबकि वृंदावन माधुर्यमयीलीला का स्थान है। अत:लक्ष्मी माता वृंदावन की ओर अपना मुख करके भगवान् श्रीकृष्ण की आराधना करने लग गईं। भगवान् श्रीकृष्ण जब महारासलीला करके अत्यंत थक गए तब लक्ष्मी माता ने अपनी साडी से अग्नि प्रज्वलित कर उनके लिए खिचडी बनाई। इस खिचडी को खाकर भगवान् श्रीकृष्ण उनसे अत्यधिक प्रसन्न हुए।
लक्ष्मी माता ने जब भगवान् श्रीकृष्ण से ब्रज में रहने की अनुमति मांगी तो उन्होंने उन्हें सहर्ष अनुमति प्रदान कर दी। यह घटना पौषमाह के गुरुवार की है। कालान्तर में इस स्थान पर लक्ष्मी माता का भव्य मंदिर स्थापित हुआ। इस मंदिर में मां लक्ष्मी वृंदावन की ओर मुख किए हाथ जोडे विराजितहैं।
साथ ही खिचडी महोत्सव आयोजित करने की परम्परा भी पडी। इसी सब के चलते अब यहां स्थित लक्ष्मी माता मंदिर में खिचडी से ही भोग लगाए जाने की ही परंपरा है। यहां पौषमाह में प्रत्येक गुरुवार को जगह-जगह असंख्य भट्टियां चलती हैं। साथ ही हजारों भक्त-श्रद्धालु सारे दिन खिचडी के बडे-बडे भण्डारे करते हैं। इस मंदिर दर्शन हेतु पौषमाह के अलावा भी वर्ष भर भक्त-श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। ब्रज चौरासी कोस की हरेक परिक्रमा भी इस स्थान पर अनिवार्य रूप से आती है।
भगवान् श्री कृष्ण ने जब सोलह हजार एक सौ आठ गोपिकाओं के साथ दिव्य महारासलीला की तब माता लक्ष्मी देवी के हृदय में भी इस लीला के दर्शन करने की इच्छा हुई और वह बेलवनजा पहुंची, परंतु उसमें गोपिकाओं के अतिरिक्त किसी अन्य व्यक्ति का प्रवेश वर्जित था। अत:उन्हें ललिता सखी ने यह कह कर दर्शन करने से रोक दिया कि आपका ऐश्वर्य लीला से सम्बन्ध है, जबकि वृंदावन माधुर्यमयीलीला का स्थान है। अत:लक्ष्मी माता वृंदावन की ओर अपना मुख करके भगवान् श्रीकृष्ण की आराधना करने लग गईं। भगवान् श्रीकृष्ण जब महारासलीला करके अत्यंत थक गए तब लक्ष्मी माता ने अपनी साडी से अग्नि प्रज्वलित कर उनके लिए खिचडी बनाई। इस खिचडी को खाकर भगवान् श्रीकृष्ण उनसे अत्यधिक प्रसन्न हुए।
लक्ष्मी माता ने जब भगवान् श्रीकृष्ण से ब्रज में रहने की अनुमति मांगी तो उन्होंने उन्हें सहर्ष अनुमति प्रदान कर दी। यह घटना पौषमाह के गुरुवार की है। कालान्तर में इस स्थान पर लक्ष्मी माता का भव्य मंदिर स्थापित हुआ। इस मंदिर में मां लक्ष्मी वृंदावन की ओर मुख किए हाथ जोडे विराजितहैं।
साथ ही खिचडी महोत्सव आयोजित करने की परम्परा भी पडी। इसी सब के चलते अब यहां स्थित लक्ष्मी माता मंदिर में खिचडी से ही भोग लगाए जाने की ही परंपरा है। यहां पौषमाह में प्रत्येक गुरुवार को जगह-जगह असंख्य भट्टियां चलती हैं। साथ ही हजारों भक्त-श्रद्धालु सारे दिन खिचडी के बडे-बडे भण्डारे करते हैं। इस मंदिर दर्शन हेतु पौषमाह के अलावा भी वर्ष भर भक्त-श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। ब्रज चौरासी कोस की हरेक परिक्रमा भी इस स्थान पर अनिवार्य रूप से आती है।
Saturday, October 17, 2009
धनतेरस की पूजा से विशेष लाभ
धनतेरस के दिन भगवान कुबेर और लक्ष्मी की पूजा का विशेष महत्व है। इस पूजा से भगवती लक्ष्मी प्रसन्न होकर आर्थिक संपन्नता और ऐश्वर्य प्रदान करती हैं। भगवान धनवंतरी का जन्मोत्सव होने के कारण इस दिन का विशेष महत्व है। आयुर्वेद के जनक भगवान धनवंतरी की पूजा-अर्चना आरोग्य प्रदान करती है। ज्योतिषाचार्य अशोक उपाध्याय पाराशर के अनुसार इस दिन संचित की गई जडी-बूटियां अमृत के समान जीवन का कायाकल्प करती हैं। धनदा त्रयोदशी जिसे धनतेरस भी कहते हैं का पर्व भारत में धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन सायंकाल में दीप दान किया जाता है तथा धनाधिपति भगवान कुबेर एवं गौरी-गणेश की पूजा श्रद्धा भाव से की जाती है। इस दिन अन्नपूर्ण स्तोत्र एवं कनकधारा स्तोत्र का पाठ करने का विधान भी है। सायंकालीन दीप दान अपमृत्यु [अकाल मृत्यु] के निर्वाणार्थ किया जाता है। इस दीप दान से पूर्वज खुश होते हैं और अपने वंशजों को आशीर्वाद देते हैं। जैसा कि शास्त्र विदित है:- मृत्युनापाश दण्डाभ्याम् कालेन श्यामयासह, ˜योदश्याम् दीपदानात् सूर्यज: प्रीयतांमम्।। अर्थात् यमपाश से मुक्ति पितर प्रसन्नता, विपरीत भाग्य से रक्षा एवं अकाल मृत्यु से बचने हेतु धनतेरस एवं यम द्वितीया को दीप दान अवश्य करना चाहिए। इस दिन स्थित लगन में बहुमूल्य रत्न एवं धातु, जवाहरात खरीदने का विशेष महत्व है। सोना-चांदी की खरीद से घर में समृद्धि बनी रहती है तथा देवी लक्ष्मी अति प्रसन्न होती हैं। बर्तन खरीदने की परंपरा भी रही है, लेकिन लौह पात्र या स्टेनलेस स्टील आदि के बर्तन खरीदने का कोई शास्त्र सम्मत प्रमाण नहीं मिलता। धनतेरस का महत्व इस दिन आयुर्वेद के जनक भगवान धनवंतरी की शुभ जयंती के कारण भी महत्व रखता है। करोडों दोषों एवं नवग्रह दोष से मुक्ति प्रदान करने वाला देवाधिदेव महादेव की प्रसन्नता हेतु प्रदोष व्रत भी इसी दिन रखा जाता है। लक्ष्मी की कृपा के लिए अष्टदल कमल बनाकर कुबेर, लक्ष्मी एवं गणेश जी की स्थापना कर उपासना की जाती है। इस अनुष्ठान में पांच घी के दीपक जलाकर तथा कमल, गुलाब आदि पुष्पों से उत्तर दिशा की ओर मुख करके पूजन करना लाभप्रद होता है। इसके अलावा ओम् श्रीं श्रीयै नम: का जाप करना चाहिए। इस दिन अपने इष्टदेव की पूजा एवं मंत्रजाप विशेष फलदायी होता है।
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