Friday, February 4, 2011

कर्म में स्वार्थ नहीं

मनुष्य नाना प्रकार के हेतु (प्रयोजन) लेकर कार्य करता है, क्योंकि बिना हेतु के कार्य हो ही नहीं सकता। कुछ लोग यश चाहते हैं, और वे यश के लिए काम करते हैं। दूसरे पैसा चाहते है, और वे पैसे के लिए काम करते हैं। कुछ अधिकार प्राप्त करना चाहते हैं, और वे अधिकार के लिए काम करते हैं। कुछ लोग मृत्यु के बाद अपना नाम छोड जाने के इच्छुक होते हैं। चीन में प्रथा है कि मनुष्य की मृत्यु के बाद ही उसे उपाधि दी जाती है। किसी ने यदि बहुत अच्छा कार्य किया, तो उसके मृत-पिता अथवा पितामह को कोई सम्माननीय उपाधि दे दी जाती है। इस्लाम धर्म के कुछ संप्रदायों के अनुयायी इस बात के लिए आजन्म काम करते रहते हैं कि मृत्यु के बाद उनकी एक बडी कब्र बने। इस प्रकार, मनुष्य को कार्य में लगाने वाले बहुत से उद्देश्य होते हैं।

प्रत्येक देश में कुछ ऐसे लोग होते हैं, जो केवल कर्म के लिए ही कर्म करते हैं। वे नाम-यश अथवा स्वर्ग की भी परवाह नहीं करते। वे केवल इसलिए कर्म करते हैं कि उससे दूसरों की भलाई होती है। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो और भी उच्चतर उद्देश्य लेकर गरीबों के प्रति भलाई तथा मनुष्य-जाति की सहायता करने के लिए अग्रसर होते हैं, क्योंकि भलाई में उनका विश्वास है और उसके प्रति प्रेम है।

देखा जाता है कि नाम तथा यश के लिए किया गया कार्य बहुधा शीघ्र फलित नहीं होता। ये चीजें तो हमें उस समय प्राप्त होती हैं, जब हम वृद्ध हो जाते हैं। असल में तभी तो उसे सर्वोच्च फल की प्राप्ति होती है और सच पूछा जाय, तो नि:स्वार्थताअधिक फलदायीहोती है, पर लोगों में इसका अभ्यास करने का धीरज नहीं रहता। यदि कोई मनुष्य पांच दिन या पांच मिनट भी बिना भविष्य का चिंतन किए, बिना स्वर्ग, नरक या अन्य किसी के संबंध में सोचे, नि:स्वार्थतासे काम कर सके, तो वह एक महापुरुष बन सकता है। यह शक्ति की महत्तम अभिव्यक्ति है-इसके लिए प्रबल संयम की आवश्यकता है। अन्य सब बहिर्मुखी कर्मो की अपेक्षा इस आत्मसंयम में शक्ति का अधिक प्रकाश होता है। मन की सारी बहिर्मुखी गति किसी स्वार्थपूर्णउद्देश्य की ओर दौडती रहने से छिन्न-भिन्न होकर बिखर जाती है, वह फिर तुम्हारे पास लौटकर तुम्हारे शक्ति विकास में सहायक नहीं होती। परंतु यदि उसका संयम किया जाए, तो उससे शक्ति की वृद्धि होती है। इस आत्मसंयम से एक महान् इच्छा शक्ति का प्रादुर्भाव होता है। वह एक ऐसे चरित्र का निर्माण करता है, जो जगत् को अपने इशारे पर चला सकता है।

प्रत्येक मनुष्य को उच्चतर ध्येयों की ओर बढने तथा उन्हें समझने का प्रबल यत्न करते रहना चाहिए। यदि तुम किसी मनुष्य की सहायता करना चाहते हो, तो इस बात की कभी चिंता न करो कि उस आदमी का व्यवहार तुम्हारे प्रति कैसा रहता है। यदि तुम एक श्रेष्ठ एवं भला कार्य करना चाहते हो, तो यह मत सोचो कि उसका फल क्या होगा। कर्मयोगी के लिए सतत कर्मशीलताआवश्यक है। बिना कार्य के हम एक क्षण भी नहीं रह सकते।

अब प्रश्न यह उठता है कि आराम के बारे में क्या होगा? यहां इस जीवन-संग्राम के एक ओर है कर्म, तो दूसरी ओर है शांति। सब शांत, स्थिर। यदि एक ऐसा मनुष्य, जिसे एकांतवास का अभ्यास है, संसार के चक्कर में घसीट लाया जाए, तो उसका ध्वंस हो जाएगा। जैसे समुद्र की गहराई में रहने वाली मछली पानी की सतह पर लाते ही मर जाती है। वह सतह पर पानी के उस दबाव की अभ्यस्त नहीं होती। इसी प्रकार, सांसारिक तथा सामाजिक मनुष्य शांत स्थान पर ले जाया जाय, तो क्या वह शांतिपूर्वक रह सकता है? कदापि नहीं।

आदर्श पुरुष वे हैं, जो परम शांत एवं निस्तब्धताके बीच भी तीव्र कर्म तथा प्रबल कर्मशीलताके बीच भी मरुस्थल की शांति एवं निस्तब्धताका अनुभव करते हैं। यही कर्मयोग का आदर्श है। यदि तुमने यह प्राप्त कर लिया, तो तुम्हें वास्तव में कर्म का रहस्य ज्ञात हो गया।

जो कार्य हमारे सामने आते जाएं, उन्हें हम हाथ में लेते जाएं और शनै:-शनै:अपने को दिन-प्रतिदिन नि:स्वार्थ बनाने का प्रयत्न करें। हमें कर्म करते रहना चाहिए तथा यह पता लगाना चाहिए कि उस कार्य के पीछे हमारा हेतु क्या है। ऐसा होने पर हम देख पाएंगे कि आरंभावस्थामें प्राय: हमारे सभी कार्यो का हेतु स्वार्थपूर्णरहता है, किंतु धीरे-धीरे यह स्वार्थपरायणताअध्यावसायसे नष्ट हो जाएगी, और अंत में वह समय आ जाएगा, जब हम वास्तव में स्वार्थ से रहित होकर कार्य करने के योग्य हो सकेंगे।

आओ वासंती हो जाए

वसंत पंचमी उमंग, उल्लास, उत्साह, विद्या, बुद्धि और ज्ञान के समन्वय का पर्व है। मां सरस्वती विद्या, बुद्धि, ज्ञान व विवेक की अधिष्ठात्री देवी हैं। उनसे हम विवेक व बुद्धि प्रखर होने, वाणी मधुर व मुखर होने और ज्ञान साधना में उत्तरोत्तर वृद्धि होने की कामना करते हैं। पुराणों के अनुसार, वसंत पंचमी के दिन ब्रह्माजी के मुख से मां सरस्वती का प्राकट्य हुआ था और जड-चेतन को वाणी मिली थी। इसीलिए वसंत पंचमी को विद्या जयंती भी कहा जाता है और इस दिन सरस्वती पूजा का विधान है।

वसंत पंचमी पर हम ऋतुओं के राजा वसंत का स्वागत करते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने दसवें अध्याय के 35वें श्लोक में वसंत ऋतु को अपनी विभूति बताया है। उन्होंने कहा है कि वसंत ऋतु मैं ही हूं। मैं मासों में मार्गशीर्ष और ऋतुओं में वसंत हूं।

मनुष्य ही नहीं, जड और चेतन प्रकृति भी इस महोत्सव के लिए श्रृंगार करने लगती है। सबके मन और देह में नई शक्ति व ऊर्जा की अनुभूति होती है। तरह-तरह के फूल खिलने लगते हैं। हरीतिमा के गलीचे बिछ जाते हैं। हरी धानी साडी, पीली-पीली फूली सरसों की चुनरिया, रंग बिरंगे फूलों का श्रृंगार, कोयल की कुहू-कुहू और भंवरों का गुंजार संदेश देते हैं कि ऋतुराज वसंत आ गया है।

संतकवितुलसीदास ने रामचरित मानस में और महाकवि कालिदास ने ऋतुसंहार में वसंत ऋतु का सुंदर वर्णन किया है। मान्यता है कि कवि कालिदास पहले अज्ञानी व महामूर्खथे, लेकिन मां सरस्वती से ज्ञान का वरदान पाकर महाकवि कालिदास हो गए थे। मां सरस्वती हमें अविवेक व अज्ञानता से मुक्ति दिलाती हैं। बुद्धि और विवेक ही है, जो मनुष्य को श्रेष्ठ प्राणी बनाता है। जीवन में इसी का प्रयोग करके मनुष्य सुख, समृद्धि एवं शांति का भोग कर सकता है।

पद्मपुराणमें वर्णित मां सरस्वती का रूप प्रेरणादायी है। वे शुभ्रवस्त्रपहने हैं। उनके चार हाथ हैं, जिनमें वीणा, पुस्तक और अक्षरमाला है। उनका वाहन हंस है। शुभ्रवस्त्रहमें प्रेरणा देते हैं कि हम अपने भीतर सत्य अहिंसा, क्षमा, सहनशीलता, करुणा, प्रेम व परोपकार आदि सद्गुणों को बढाएं और काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह, अहंकार आदि दुर्गुणों से स्वयं को बचाएं। चार हाथ हमारे मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार रूपी अंत:करण चतुष्ट्य का प्रतीक हैं। पुस्तक ज्ञान का प्रतीक है, अक्षरमाला हमें अध्यात्म की ओर प्रेरित करती है। दो हाथों में वीणा हमें ललित कलाओं में प्रवीण होने की प्रेरणा देती है। जिस प्रकार वीणा के सभी तारों में सामंजस्य होने से लयबद्ध संगीत निकलता है, उसी प्रकार मनुष्य अपने जीवन में मन व बुद्धि का सही तारतम्य रखे, तो सुख, शांति, समृद्धि व अनेक उपलब्धियां प्राप्त कर सकता है। सरस्वती का वाहन हंस विवेक का परिचायक है। विवेक के द्वारा ही अच्छाई-बुराई में अंतर करके अच्छाई ग्रहण की जा सकती है।

कुछ चित्रों में मां सरस्वती को कमल पर बैठा दिखाया जाता है। कीचड में खिलने वाले कमल को कीचड स्पर्श नहीं कर पाता। यानी हमें चाहे कितने ही दूषित वातावरण में रहना पडे, परंतु बुराई हम पर प्रभाव न डाल सके। मां सरस्वती की पूजा-अर्चना इस बात की द्योतक है कि उल्लास में बुद्धि व विवेक का संबल बना रहे।

आज अभावों व कुंठाओं में कभी-कभी जिंदगी की कशमकश इस वासंती रंग को फीका करने लगती है। तो क्यों न हम वसंत से प्रेरणा लेकर जीवन को संपूर्णता से जिएं और कामना करें कि सबके जीवन में खुशियों के फूल सदा खिलते रहें। वसंत ऋतु जैसा उल्लास व सुंदरता बनी रहे, क्योंकि जो सत्य है, वही शिव है और वही सुंदर है।

Sunday, January 2, 2011

ऊं नम: शिवाय से गूंजी पहाड़ी

रातू रोड स्थित रांची की पहाडी पर विराजमान बाबा पहाडी का 14वां वार्षिकोत्सव रूद्राभिषेक के साथ शनिवार को शुरू हो गया। कार्यक्रम का समापन रविवार को होगा।

महाकाल मंदिर, काली मंदिर, विश्वनाथ मंदिर सहित परिसर और सीढियों को रंग-बिरंगे फूलो से सजाया गया । बंगाल एवं उडीसा के 25 कलाकारों ने दिन-रात एक कर विशालकाय नाग का निर्माण किया है। हाल की छत पर विशाल पंडाल बनाया गया है, जहां भोलेश्वर की भव्य झांकी बनी है। वही, मुख्य हाल की झांकी में समुद्र मंथन का दृश्य दिखाई दे रहा है। रात में बिजली की जगमग से पहाडी चमक रही है। पूरा मंदिर प्रांगण ओम नम: शिवाय के पंचाक्षरी मंत्रों से गूंज रहा था। वहीं, महामृत्युंजय मंत्र के अलावा शिव के अन्य मंत्रों से भी मंदिर का मुख्य परिसर गूंज रहा था। दुग्ध, बेल पत्र से भगवान का अभिषेक किया गया। भगवान की पूजा के लिए भक्तों की अपार भीड सुबह से ही शुरू से ही शुरू हो गई थी।

कार्यक्रम की शुरुआत ध्वज पूजा के साथ हुई। इसके बाद रूद्राभिषेक किया गया। सांय तुलसी कृत मानस के सुंदरकांड का पाठ किया गया।

Friday, December 31, 2010

46 साल से गूंज रही रामधुन

जामनगर। यहां पर एक ऐसा मंदिर है जहां पिछले 46 साल से रामधुन लगातार गूंज रही है। इस कारण मंदिर का नाम गिनीज बुक में भी दर्ज हो चुका है।

इस बाल हनुमान मंदिर में प्रतिदिन अलग-अलग पालियों में भगवान राम की प्रार्थना की जाती है। इसके लिए एक दिन पहले लोगों के नाम तय किए जाते हैं और इसे मंदिर के नोटिस बोर्ड पर लगाया जाता है। इसे देखकर लोग प्रार्थना केलिए अपने समय का ध्यान रखते हैं।

मंदिर के ट्रस्टी जैसुखभाई गुसानी के अनुसार मंदिर का निर्माण 1961 में प्रेम भीकुजी महाराज द्वारा कराया गया था। तीन वर्ष बाद उन्होंने यहां अपने अनुयायियों के साथ रामधुन की शुरुआत की थी। उसके बाद से लगातार यहां श्रीराम जय राम जय जय राम की धुन जारी है।

राम धुन गाने वाले सभी श्रद्धालु होते हैं। इसमें महिलाएं और बच्चे भी भाग लेते हैं। गिनीज बुक की ओर से मंदिर को 1984 और 1988 में प्रमाणपत्र दिया जा चुका है। गुसानी के अनुसार मंदिर में प्रार्थना में कोई रुकावट न आए, इसके लिए ट्रस्ट ने दिन और रात के लिए रामधुन गाने वाले चार गायकों की व्यवस्था की है। यहां 2001 में आए विनाशकारी भूकंप के दौरान भी प्रार्थना बंद नहीं हुई थी।

Saturday, December 18, 2010

रूप, जय, तेज व यश देती है एकादशी

राजधानी में देवोत्थान एकादशी का पर्व धूमधाम से मनाया गया। इस मौके पर लक्ष्मी-नारायण के साथ भगवान शालिग्राम व तुलसी मैया की पूजा-अर्चना हुई। श्रद्धालुओं ने शालिग्राम व तुलसी को पवित्र गंगाजल से स्नान कराकर मनोकामना सिद्धि की प्रार्थना की।
समस्त एकादशियों में निर्जला एकादशी व देवोत्थान एकादशी का विशेष महत्व है। मनुष्य यदि निर्मल एवं पवित्र भाव से इन एकादशियों में पूजा-अर्चना करे तो संसार में रूप, जय, तेज व यश की प्राप्ति होती है। उसके समस्त विकार तत्काल दूर हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि शालिग्राम प्रभु व तुलसी मईया का बहुत ही भावनात्मक एवं निर्मल रिश्ता है। पर्यावरण की दृष्टि से भी तुलसी के पौधे के हमारे जीवन में विशेष महत्व है। जिस घर में तुलसी का पौधा होता है, वह वातावरण हमेशा स्वच्छ रहता है। तुलसी के पौधे में समस्त देवी-देवताओं का निवास भी है।

Saturday, November 6, 2010

जीवन सरल बनाएं

आधुनिक जीवन अत्यधिक असंतोषजनक बनता जा रहा है। यह हमें प्रसन्नता नहीं प्रदान करता। इसमें बहुत सी जटिलताएं हैं, बहुत सी इच्छाएं हैं। हम अत्यधिक आवश्यकताओं से स्वयं को मुक्त करें और ईश्वर के साथ अधिक समय व्यतीत करें। अपने जीवन को सरल बनाएं। अपने अंतर में, अपनी आत्मा से प्रसन्न रहें। हम अपने बचे हुए समय को ध्यान में लगाएं, जो ईश-संपर्क प्रदान करता है तथा शांति एवं प्रसन्नता रूपी जीवन की वास्तविकताओंकी प्राप्ति में सच्ची प्रगति प्रदान करता है।

अपना जीवन सरल बनाएं और उतने में ही आनन्द लें जो हमें ईश्वर ने दिया है। अपना खाली समय स्वाध्याय में लगाएं। ईश्वर की मौन वाणी समस्त प्राणी-जगत का आधार है,धर्म-ग्रन्थों के माध्यम से और हमारे अंत:करण के माध्यम से सदा हमें पुकारती रहती है। चिरस्थायी आनंद प्राप्ति के लिए भौतिक धन-संपदा पर विश्वास करना उचित नहीं है। सरल जीवन के द्वारा हमें सर्वसंतुष्टिदायकप्रसन्नता प्राप्त होती है। सादगी का अर्थ है इच्छाओं और आसक्तियोंसे मुक्त रहना और आंतरिक रूप से परमानन्द में मग्न रहना। सरलता से जीवनयापन करने के लिए हमें प्रबल मन और अदम्य इच्छाशक्ति की आवश्यकता होती है। इसका अर्थ यह नहीं कि हम अभाव में रहें, बल्कि हम उसी के लिए प्रयास करें और उसी में संतोष करें जिस चीज की हमें वास्तव में आवश्यकता है। जब हमारी अंतरात्मा मानसिक रूप से सांसारिक वस्तुओं का परित्याग कर देती है, तो हमें स्थायी रूप से संतुष्टि करने वाले आनंद की प्राप्ति होने लगती है। जब हम ईश्वर की इच्छा के अनुसार अपने कर्मो का चयन करते हैं, तो जीवन सरल हो जाता है। यदि हम अपना मन निर्मल रखें, तो हम सदा ईश्वर को अपने साथ पाएंगे। हम अपने प्रत्येक विचार में उनकी झलक देखेंगे। एक निर्मल हृदय निर्मल विचारों का परिणाम होता है। हम स्वयं एक छोटे बच्चे के समान सरल बनकर,आसक्ति रहित,सच्चा एवं भोला बनकर ब्रह्म चैतन्य प्राप्त करने की चेष्टा करके उस दिव्य अवस्था को प्राप्त कर सकते हैं। भक्त अंत: प्रज्ञा से परिपूर्ण हो जाता है जो शिशु समान निष्कपट होता है, संशय रहित होता है, सत्यनिष्ठा से पूर्ण होता है तथा विनम्र एवं ग्रहणशील होता है। ऐसा भक्त ईश्वर को प्राप्त करता है।

Friday, October 22, 2010

दस श्रेष्ठ मुहूर्तो में मिलेगा खरीददारी का मौका

दीपावली के अवसर पर आगामी पंद्रह दिनों में दस मुहूर्तो में लोगों को खरीददारी का विशेष मौका मिलेगा। इसमें 30अक्टूबर को पुष्यनक्षत्र और 3नवंबर को धनतेरस के दो योग तो खरीददारी के लिहाज से महायोगहोंगे। धनतेरस पर बन रहा महायोगअगली बार 14साल बाद बनेगा।

खरीददारी के इन श्रेष्ठ मुहूर्तो की शुरुआत 22अक्टूबर शुक्रवार से होगी। जब लोग शरद पूर्णिमा में खरीददारी करेंगे। यह मुहूर्त शाम चार बजे के बाद शुरू होगा। इसके अलावा 24,25,28,29,30अक्टूबर, 2,3,4और 5नवंबर को भी कई ऐसे योग है, जो शास्त्रों में नया आइटम घर लाने के लिए श्रेष्ठ माने गए है। एक साथ आ रहे इन मुहूर्तो को लेकर उत्साही व्यापारी कहते हैं कि नवरात्रि से प्रारंभ हुआ खरीददारी का दौर इन मुहूर्तो में चरम पर रहेगा। अनुमान है कि वाहन, ज्वैलरी,प्रापर्टी, इलेक्ट्रानिक आइटम, गारमेंट्स, फर्नीचर, मोबाइल, सजावटी आइटम आदि की जमकर बिक्री होगी।

धनतेरस का दिन खरीददारी का महायोगमाना जाता है। बुधवार गणेश जी का वार है। इस दिन लोग खरीददारी को विशेष महत्व देते है। इस बार यह दोनों ही दिन एक साथ आ रहे हैं। जो खरीददारी में चार चांद लगा देंगे। ऐसा अवसर इसके बाद 30अक्टूबर 2024को बनेगा। यानी लोगों को फिर ऐसे शुभ दिन के लिए 14साल का लंबा इंतजार करना पडेगा। श्री शर्मा ने बताया कि शरद पूर्णिमा 22अक्टूबर से खरीददारी के मुहूर्तो की शुरुआत हो जाएगी। इसके बाद धनतेरस तक कई मुहूर्त ऐसे हैं, जिनमें लोग खरीददारी कर सकते हैं।


खरीददारी के शुभ मुहूर्त

22अक्टूबर शरद पूर्णिमा

24अक्टूबर रविवार, भडनीनक्षत्र

25अक्टूबर सर्वार्थसिद्धि योग

28 अक्टूबर सर्वार्थसिद्ध योग, रवि योग

29अक्टूबर सर्वार्थसिद्धि योग

30अक्टूबर पुष्यनक्षत्र

2नवंबर सर्वार्थसिद्ध योग

3नवंबर धनतेरस, सर्वार्थसिद्धि योग, बुधवार

4नवंबर नरक चतुदर्शी,हनुमान जयंती

5नवंबर दीपावली

6नवंबर गोवर्धनपूजा, सर्वार्थसिद्धि योग


दीपावली से पहले पुष्यनक्षत्र

दीपावली से पहले आने वाले पुष्यनक्षत्रों को शास्त्रों में विशेष महत्व दिया गया है। इस बार 5नवंबर को दीपावली से पहले 30अक्टूबर को पुष्यनक्षत्र का शुभ योग है। पुष्यनक्षत्र सभी नक्षत्रों का राजा होता है। यह दिन खरीददारी के लिए उत्तम है। व्यापारी भी इस दिन ही अपने बहीखातों और कलम की खरीददारी को शुभ मानते है।


पांच को ही मनेगी दीपावली

दीपावली की तिथि में उलटफेर को लेकर पंडितों ने एकमत से कहा है कि पांच नवंबर को दीपावली मनाई जाएगी। उद्यातिथि को लेकर कोई भ्रम नहीं रहना चाहिए। उनका कहना है कि तीन नवंबर को द्वादशी तिथि दोपहर 3.59बजे समाप्त होगी। इसके बाद धनत्रयोदशीव प्रदोषकालउसी दिन माना जाएगा। अगले दिन चार नवंबर को शाम 4.11बजे के बाद रूप चौदस की तिथि शुरू हो जाएगी। पांच नवंबर को दोपहर 1.04बजे तक चतुदर्शीकी तिथि के बाद दीपोत्सव का पर्व शुरू होगा। छह नवंबर को अन्नकूटमहोत्सव मनाया जाएगा।